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Coronavirus : गंभीर मरीजों की जान बचाएगी हेमोलंग रेस्पिरेटरी डिवाइस, आपातकाल में इस्तेमाल को मिली मंजूरी

Highlights-Coronavirus को लेकर तमाम प्रकार की रिसर्चें (Coronavirus Research) भी सामने आ रही हैं-अमेरिका की पीटर्सबर्ग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी डिवाइस तैयार की है, जिसकी मदद से मरीजों (Coronavirus Treatment) के खून में मौजूद ऑक्सीजन को आसानी से निकाला जा सकता है-इस डिवाइस का नाम है हेमोलंग रेस्पिरेटरी डिवाइस (Hemolung Respiratory Device)

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Coronavirus : गंभीर मरीजों की जान बचाएगी हेमोलंग रेस्पिरेटरी डिवाइस, आपातकाल में इस्तेमाल को मिली मंजूरी

Coronavirus : गंभीर मरीजों की जान बचाएगी हेमोलंग रेस्पिरेटरी डिवाइस, आपातकाल में इस्तेमाल को मिली मंजूरी

नई दिल्ली. दुनिया भर में कोरोना वायरस (Coronavirus Outbreak) से हाहाकार मचा है। कोरोना वायरस (Coronavirus) की अभी तक कोई वैक्सीन नहीं बन पाई है। वहीं, इसे लेकर तमाम प्रकार की रिसर्चें (Coronavirus Research) भी सामने आ रही हैं। भारत में फिलहाल कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिए 3 मई तक लॉकडाउन (Lockdown 2.0) लागू है। कोरोना वायरस (COVID-19) को रोकने या इसके उपचार के लिए कोई भी खास दवा नहीं है। कोरोना वायरस के इलाज को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि अब तक इसकी कोई दवा उपबल्ध नहीं है। दवा बनाने के लिए बहुत से देश लगातार कोशिश कर रहे हैं। इसी क्रम में अमेरिका की पीटर्सबर्ग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी डिवाइस तैयार की है, जिसकी मदद से मरीजों के खून में मौजूद ऑक्सीजन को आसानी से निकाला जा सकता है। इस डिवाइस का नाम है हेमोलंग रेस्पिरेटरी डिवाइस (Hemolung Respiratory Device)। यह डिवाइस मरीज के लिए फेफड़े का काम करेगी जैसे डायलिसिस की मशीन किडनी का काम करती है।

मशीन के चलते करना पड़ेगा मरीज को बेहोश

यूनिवर्सिटी के स्वॉनसन स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग के बायो इंजीनियर प्रो. विलियम फेडरस्पील के मुताबिक हेमोलंग मशीन से खून में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड को आसानी से निकाला जा सकता है। वे बताते हैं कि वेंटिलेटर से फेफड़ों को अधिक नुकसान हो रहा है। इस मशीन के चलते मरीज को बेहोश नहीं करना पड़ेगा।


अमेरिका में चल रहा क्लीनिकल ट्रायल

एफडीए ने आपातकाल में इसके इस्तेमाल के लिए मंजूरी दे दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे गंभीर कोरोना रोगियों को बचाया जा सकेगा। सीओपीडी और श्वास के गंभीर रोगियों के लिए यह मशीन बनाई गई थी। यूरोप में इस मशीन को अनुमति 2013 में मिल गई थी जबकि अमेरिका में अभी इसका क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है।