
Residential Garbage Pickup
नई दिल्ली। एक बार अपने घर या ऑफिस के कोने में रखे बदबूदार डस्टबिन को गौर से देखिए। डस्टबिन में कागज, पॉलिथिन, बीयर और कैन्स, दवाइयां, कांच के टुकड़े, ब्लेड, सड़ी हुई सब्जियां, मीट और हड्डियां और भी न जाने क्या-क्या मिल जाएगा।
देश का दिल कहे जाने वाली राजधानी दिल्ली से रोज 689.5 टन कचरा निकलता है। हमारे पास अभी तक इस कचरे के निपटारे का कोई उपाय नहीं है। इसलिए ये सारा कचरा शहर के आसपास ही पहाड़ बन कर खड़ा हो गया है।
आप दिल्ली में ही देख लीजिए यहां तीन बड़े कचरें के ऐसे पहाड़ हैं जिन्हें अगर आप मिला तो ये विश्व के सबसे छोटे शहर वैटिकन सिटी के भी दो गुना हैं। दरअसल शहर में इकठ्ठा होने वाला कूड़ा हमारी ही कारगुजारियों का नतीजा है।
अगर कोई कसर बाकी रह जाती है तो उसे पूरा कर देती है सरकार, जो कभी कभार ही इस पर ध्यान देती है भले ही देश में सफाई अभियान जोरों पर हो लेकिन असल हालात कुछ और ही कहानी बयां करते है।
चलिए जानते है कि कहां से निकलता है कूड़ा और कहां पहुंचता है
कूड़ा हमारे घरों और गली-मोहल्ले से निकलकर सबसे नजदीकी डंपिंग जोन पर पहुंचता है। जहां सड़क किनारे आपको कूड़े की भयंकर बदूब आए तो समझ लीजिए वही है डंपिंग जोन। नजदीकी डंपिंग पहुंचने से पहले ही हवा का झोंका वहां मौजूद कूड़े का मंजर बता देता है।
ये वहीं डंपिंग जोन है जिसके आगे से जब आप निकलते है तो सरकार को गालियों से नवाजते है और फिर मुंह पर रुमाल रख कर धीरे-धीरे से खिसक जाते है इसके बाद की कहानी आप जानते ही है कि घर पहुंचते ही न कूड़ा याद रहता है और कूड़े की भयानक दुर्गंध।
खैर जहां आप कूड़े के बारे में सोचना छोड़ते है वहीं से नगरपालिका/नगर निगम के कर्मचारी का काम शुरू होता है। निगम के कर्मचारी इन डंपिंग जोन्स पर पड़ा कूड़ा अपनी गाड़ियों में लादते हैं। ये गाड़ियां कूड़े को महाडंपिंग साइट पर डाल आती हैं। इस महासाइट को लैंडफिल स्पॉट के नाम से पुकारा जाता है।
दिल्ली में 3 लैंडफिल ग्राउंड्स हैं। जो कि गाजीपुर, ओखला और भलस्वा में है। गाजीपुर में जो 45 मीटर ऊंचा कूड़े का ढेर है, रिहायशी इमारतों में एक मंजिल की ऊंचाई करीब 3 मीटर होती है। इस लिहाज से गाजीपुर में जो कूड़े का अंबार है, वो तकरीबन 15 मंजिला इमारत के बराबर है।
गाजीपुर में तीन से साढ़े तीन हजार मीट्रिक टन कूड़ा फेंका जाता है। यहां हर रोज 600 से ऊपर ट्रक कूड़ा लेकर आते है। एक रिपोर्ट के मुताबिक नगरपालिका के बजट में सैनिटेशन के लिए जो रकम दी जाती है, उसकी लगभग 85 फीसदी रकम तो कूड़े को लाने-ले जाने में ही खर्च हो जाती है।
म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट्स 2000 में नियम ये है कि लैंडफिल्स बनाने के लिए किसी ऐसी जगह को चुना जाना चाहिए जिसके आस-पास कोई रिहायशी इलाका न हो। इसका सीधा सा मतलब इस बात से है कि लैंडफिल ग्राउंड्स इंसानी आबादी से दूर होना चाहिए।
लेकिन दिल्ली स्थित लैंडफिल से ये बात साफ पता चलती है कि ये नियम बस कहने के लिए ही बनाए गए है। शुरुआत में इसकी अधिकतम सीमा 15 मीटर तय की गई थी। ये नियम इसलिए बनाए गए हैं, ताकि उन्हें तोड़ा जा सके।
70 एकड़ में फैला यह लैंडफिल 1984 में शुरू हुआ था। जो कि साल 2002 में अपनी क्षमता के मुताबिक भर चुका था। लेकिन इसके बाद भी यहां कूड़े के ढ़ेर को पहाड़ में तब्दील किया गया न तो सरकार की नींद खुल रही है और न ही लोगों की।
Updated on:
15 Dec 2019 02:45 pm
Published on:
15 Dec 2019 02:40 pm
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