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Eid al-Ghadir: जानें कैसे और किस आधार पर शिया-सुन्नी में बंटे थे मुसलमान?

ये दोनों समुदाय अल्लाह के पैगंबर मुहम्मद (Rasul Allah) के रहने तक एक था। पैगंबर के बाद उनके वारिस पर अलग राय के चलते ये समुदाय शिया और सुन्नी (Shia and Sunni) में बट गया। ईद-ए-ग़दीर (Eid al-Ghadir) के दिन मुसलमानों को शिया और सुन्नी में बांट दिया गया

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Vivhav Shukla

Aug 09, 2020

On the day of Eid-e-Ghadir, Muslims divided into Shia and Sunni

On the day of Eid-e-Ghadir, Muslims divided into Shia and Sunni

नई दिल्ली। इस्लाम धर्म (Islam religion) विश्व में दूसरा सबसे बड़ा माने जाना वाला धर्म है। विश्व में करीबन 1.8 अरब लोग इस धर्म का पालन करते हैं। ये धर्म दो समुदायों में बटा हुआ है। हालांकि दोनों समुदाय की क़ुरान एक ही है। ये दोनों समुदाय अल्लाह के पैगंबर मुहम्मद (Rasul Allah) के रहने तक एक था। पैगंबर के बाद उनके वारिस पर अलग राय के चलते ये समुदाय शिया और सुन्नी (Shia and Sunni) में बट गया। दुनियाभर के तमाम मुसलमान इन्हीं दो समुदायों के भीतर आते हैं।

कैसे हुआ बटवारा?

पैगंबर मुहम्मद (paigambar muhammad sahab) के चचेरे भाई और उनके दामाद हजरत अली (Hazrat Ali) के आधार पर मुसलमान दो समुदायों शिया और सुन्नी में बंटा था। हजरत अली (Hazrat Ali) ने पैगंबर की बेटी फातिमा से शादी की थी। शिया समुदाय के मुताबिक, रसूल अल्लाह (पैगंबर) ने खुद ऐलान किया था, उनके बाद, उनके उत्तराधिकारी अली होंगे।

लेकिन सुन्नी समुदाय(Sunni Community) इस दावे से सहमत नहीं। पैगंबर के निधन के बाद सुन्नी समुदाय ने अबु-बकर (Abu Bakr) को अपना नेता माना। सुन्नी वर्ग के लोगों के मुताबिक अबू बकर ही अल्लाह का असली उत्तराधिकारी था। जबकि शिया का मानना है कि अली और उनके वारिस हजरत मुहम्मद के सही वारिस हैं।

शिया और सुन्नी में अंतर इसी बात से शुरू हुआ था। शिया समुदाय, सुन्नियों के मुताबिक पैगंबर के बाद के माने गए तीनों खलीफाओं अबु-बकर, उमर और उस्मान को मुसलमानों का राजनीतिक नेता तो मानते हैं, लेकिन धार्मिक रहबर के नजरिए से इन तीनों को खलीफा नहीं मानते। शिया समुदाय पैगंबर के बाद खलीफा नहीं, इमाम को मानता है।

शिया समुदाय के मुताबिक, पैगंबर 10 हिजरी को पैग़म्बर ने आखिरी हज किया था। इस हज के बाद ही उन्होंने अली का हाथ पकड़, लोगों को उनसे परिचित कराया। अपने उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्ति का ऐलान करते हुए कहा, मन कुन्तो मौलाहो फ़हाज़ा अलीयुन मौलाह. यानी जिस जिसका मैं मौला, उस उसके अली मौला। शिया समुदाय 18 ज़िलहिज्ज को ईद-ए-ग़दीर के रूप में मनाता है।

बता दें सुन्नी वर्ग के लोग सुन्ना का पालन करते हैं, जो उनके मुताबिक, हजरत मोहम्मद द्वारा बताये गए नियमों से परिपूर्ण है। वहीँ शिया वर्ग के लोग अयातुल्ला को भगवान का प्रतिक मानते हैं।