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हैदराबाद एनकाउंटर: पुलिसवालों को शाबाशी, माफी या सजा? जानिए क्या कहता है कानून

तढ़के 3 बजे चारों आरोपियों को ढेर किया लोगों ने हैदराबाद पुलिस की जमकर की तारीफ

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नई दिल्ली: आज सुबह हैदराबाद ( Hyderabad ) से खबर आई कि पशु चिकित्सक के साथ हैवानियत करने वाले चारों आरोपियों को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया है। इस खबर के फैलने के बाद लोगों ने कहा कि अब महिला की आत्मा को शांति मिलेगी। हर कोई पुलिस के इस कदम की जमकर तारीफ कर रहा है। लेकिन क्या इसके बाद पुलिस पर सवाल नहीं उठेंगे? आखिर अब उन पुलिस वालों के साथ क्या होगा? इस पर हमारा कानून क्या कहता है?

पहले जानिए कैसे हुआ एनकाउंटर

तेलंगाना पुलिस के अनुसार आरोपियों को राष्ट्रीय राजमार्ग-44 पर क्राइम सीन रीक्रिएट करने के लिए ले जाया गया था। इस दौरान आरोपियों ने पुलिस हिरासत से भागने की कोशिश की। इसके बाद पुलिस ने उनपर गोलियां चला दीं। इस मुठभेड़ में आरोपी मोहम्मद आरिफ, नवीन, शिवा और चेन्नाकेशावुलू यानि चारों आरोपियों की मौके पर ही मौत हो गई। शमशाबाद के डीसीपी प्रकाश रेड्डी ने कहा, 'सायबराबाद पुलिस आरोपियों को क्राइम सीन रीक्रिएट करने के लिए लाई थी ताकि घटना से जुड़ी कड़ियों को जोड़ा जा सके। इसी बीच आरोपियों ने पुलिस से हथियार छीने और उनपर फायरिंग की। आत्मरक्षा में पुलिस ने उन्हें गोली मारी जिसमें आरोपियों की मौत हो गई।'

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अब क्या होगा पुलिस वालों का?

जहां एक तरफ पूरा देश हैदराबाद में हुए एनकाउंटर पर पुलिसवालों की जमकर तारीफ कर रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ ये सवाल भी खड़ा हो रहा है कि आखिर अब इन पुलिसवालों के साथ क्या होगा? दरअसल, जब भी पुलिसवाले किसी आरोपी का एनकाउंटर करते हैं तो पहली शर्त ये होती है कि पुलिस वालों को आरोपी के पैर में गोली मारनी होती है ताकि वो उसे जिंदा पकड़ा जा सके, लेकिन इस केस में पुलिसवालों ने ऐसा नहीं किया। दूसरी बात जब भी पुलिसवाले कोई एनकाउंटर करते हैं तो उसकी जांच लगभग हर बार होती है। इस जांच में देखा जाता है कि क्या सच में पुलिसवालों ने आत्मरक्षा में ये कार्यवाही की या फिर कुछ और वजह थी। इसके लिए उस सीन को दोबारा क्रिएट किया जाता है, ताकि पता लगाया जा सके कि एनकाउंटर सही था या फिर गलत।

क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट?

ऐसे एनकाउंटर पर सुप्रीम कोर्ट के क्या दिशानिर्देश है, ये जानने की भी बेहद जरूरत है। इसके लिए आपको 'पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र सराकर' मामले में हुई पुलिस मुठभेड़ में मौतों और गंभीर रूप से घायल होने की घटनाओं के बारे में बताते हैं। इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 16 दिशानिर्देश जारी किए थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इन दिशानिर्देशों का पालन सम्पूर्ण, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए मानक प्रक्रिया के तौर पर किया जायेगा। दिशानिर्देशों में मुठभेड़ में हुई मौतों के मामले में अनिवार्य रूप से मजिस्ट्रेट जांच कराना और बगैर किसी विलंब के पीड़ितों के निकटतम परिजनों को इसकी जानकारी देना शामिल है। मुठभेड़ के तुरंत बाद, प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए और अपराध जांच विभाग (सीआईडी) अथवा दूसरे पुलिस स्टेशन की पुलिस टीम द्वारा घटना/मुठभेड़ की स्वतंत्र जांच की जानी चाहिए। यह जांच मुठभेड़ में शामिल पुलिस टीम के मुखिया से कम से कम एक पद ऊपर के वरिष्ठ अधिकारी की निगरानी में होनी चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा था कि यदि पीड़ित के परिजनों को ऐसा लगता है कि पुलिस सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय प्रक्रिया का अनुसरण करने में असफल रही है, तो वे संबंधित इलाके के सत्र न्यायाधीश के यहां शिकायत कर सकते हैं। न्यायालय ने मुठभेड़ की घटना के तुरंत बाद ऐसे अधिकारियों को बारी के बगैर (आउट ऑफ टर्न) पदोन्नति या वीरता पुरस्कार दिये जाने से प्रतिबंधित कर दिया था।