
रंगीन पतंगें, बेरंग होती जिंदगियां
मकर संक्रांति उल्लास, परंपरा और सामाजिक मेल-जोल का पर्व है। देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे पतंगों के रंग-बिरंगे आकाश, तिल-गुड़ की मिठास और आपसी सौहार्द के साथ मनाया जाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से यही पर्व एक और वजह से चर्चा में रहने लगा है, नायलॉन और धारदार मांझे से होने वाली जानलेवा घटनाओं के कारण। मकर संक्रांति पर्व पर कर्नाटक के बीदर जिले में एक दुपहिया वाहन सवार पतंग के खतरनाक मांझे का शिकार बना। कर्नाटक की हालिया घटना कोई अकेली या अपवाद नहीं है। हर साल मकर संक्रांति के आसपास देश के विभिन्न राज्यों से ऐसी खबरें सामने आती हैं, जिनमें राह चलते लोग, दोपहिया वाहन सवार, बच्चे और यहां तक कि पक्षी भी पतंग के खतरनाक मांझे का शिकार बनते हैं। कहीं गला कटता है, कहीं हाथ या चेहरे पर गंभीर चोट लगती है, तो कहीं एक खुशहाल परिवार अचानक मातम में डूब जाता है।
सबसे चिंता की बात यह है कि यह खतरा दिखाई नहीं देता। नायलॉन या केमिकल-कोटेड मांझा इतना पतला और धारदार होता है कि वह आंखों से नजर ही नहीं आता, लेकिन उसका असर जानलेवा साबित होता है। त्योहार की मस्ती में उड़ाई गई एक पतंग किसी अनजान राहगीर के लिए मौत का फंदा बन जाती है। प्रशासन की ओर से कई राज्यों में नायलॉन मांझे पर प्रतिबंध है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नियमों का पालन बेहद कमजोर है। बाजारों में प्रतिबंधित मांझा आसानी से मिल जाता है और निगरानी तंत्र अक्सर त्योहार बीत जाने के बाद हरकत में आता है, जब तक कई जानें जा चुकी होती हैं। यह केवल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है। समाज के रूप में भी हमें आत्ममंथन करना होगा। सवाल यह है कि क्या हमारा त्योहार किसी और की जान से ज्यादा कीमती है? क्या परंपरा के नाम पर हम असावधानी और लापरवाही को जायज ठहरा सकते हैं?
आज जरूरत है ठोस कदम उठाने की। प्रतिबंधित मांझे की बिक्री और इस्तेमाल पर सख्ती से रोक और वास्तविक कार्रवाई हो। त्योहारों से पहले व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए, ताकि लोग इसके खतरों को समझ सकें। आपातकालीन सेवाओं की त्वरित उपलब्धता हो, ताकि दुर्घटना होने पर हर सेकंड की कीमत जान बन सके। मकर संक्रांति का संदेश सूर्य के उत्तरायण होने के साथ नए जीवन, नई ऊर्जा और सकारात्मकता का है। यदि इस पर्व पर असावधानी से किसी की जिंदगी खत्म हो जाए, तो यह हमारे समाज के लिए गंभीर चेतावनी है। अब समय आ गया है कि हम तय करें कि त्योहार मनाना है, मातम नहीं।
ashok.singh@in.patrika.com
Published on:
15 Jan 2026 09:18 pm
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