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एक छोटे से पुस्तकालय ने बदली गांव की तकदीर, 75 युवाओं को मिली सरकारी नौकरी

मजबूत इरादे, सामूहिक प्रयास और शिक्षा के प्रति लगन हो तो एक छोटा-सा पुस्तकालय भी पूरे गांव की तकदीर बदल सकता है। केरल के वायनाड जिले के थेत्तमाला गांव में संघचेतना पुस्तकालय ने इसे सच कर दिखाया है। कभी चाय बागानों तक सीमित अवसरों के बीच जीवन बिताने वाले इस गांव के करीब 75 युवा आज सरकारी सेवाओं में कार्यरत हैं। कई अन्य युवाओं ने चिकित्सा, इंजीनियरिंग, शिक्षण और दूसरे व्यावसायिक क्षेत्रों में भी अपनी पहचान बनाई है। इस बदलाव की शुरुआत वर्ष 2006 में स्थानीय युवाओं के एक समूह ने की थी। सीमित संसाधनों के बीच किराए के एक छोटे से कमरे में शुरू हुआ यह पुस्तकालय धीरे-धीरे गांव के युवाओं के लिए शिक्षा, मार्गदर्शन और रोजगार की उम्मीद बन गया। आज यह केवल किताबें पढ़ने की जगह नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयासों से भविष्य संवारने की मिसाल है।
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एक पुस्तकालय (फाइल फोटो)।

एक पुस्तकालय (फाइल फोटो)।

सफलता मिली तो अगली पीढ़ी का थामा हाथ

पुस्तकालय से जुड़े युवाओं ने केरल लोक सेवा आयोग (पीएससी) की परीक्षाओं की तैयारी शुरू की। शुरुआती समूह के कई युवाओं को सरकारी नौकरी मिली तो उनकी सफलता ने दूसरे विद्यार्थियों को भी प्रेरित किया। खास बात यह रही कि सफल युवा अपनी उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहे। वे पुस्तकालय लौटे और अगली पीढ़ी के विद्यार्थियों को पढ़ाने तथा प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में मार्गदर्शन देने लगे। इससे गांव में सहयोग की ऐसी परंपरा विकसित हुई, जिसमें एक पीढ़ी की सफलता दूसरी पीढ़ी के लिए रास्ता तैयार करने लगी। सामूहिक अध्ययन, नियमित तैयारी और एक-दूसरे का हौसला बढ़ाने से युवाओं का आत्मविश्वास मजबूत हुआ। सरकारी नौकरी और उच्च शिक्षा अब उनके लिए दूर का सपना नहीं, बल्कि मेहनत से हासिल किया जा सकने वाला लक्ष्य बन गए।

पढ़ाई से आगे बढ़कर सामाजिक बदलाव की पहल

समय के साथ संघचेतना पुस्तकालय की भूमिका का विस्तार हुआ। यह प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के साथ सामाजिक गतिविधियों का भी केंद्र बन गया। यहां स्वयं सहायता समूहों, महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों के मंच, जरूरतमंद मरीजों की देखभाल तथा फुटबॉल प्रशिक्षण जैसी गतिविधियों को बढ़ावा मिला। पुस्तकालय से जुड़े लोगों का मानना है कि गांव के युवाओं में आगे बढ़ने की इच्छा पहले से थी। जरूरत सही दिशा, संसाधनों और सहयोग की थी। पुस्तकालय ने इन जरूरतों को पूरा करने की कोशिश की और बच्चों तथा युवाओं को अपने गांव से बाहर उपलब्ध शिक्षा एवं रोजगार के व्यापक अवसरों से परिचित कराया।

अब अपने भवन का सपना

करीब दो दशक की इस यात्रा में पुस्तकालय ने कई युवाओं को नई राह दिखाई है, लेकिन उसके सामने अब भी एक चुनौती है। वर्षों से किराए के कमरे में चल रहे पुस्तकालय के पास अपना भवन नहीं है। समुदाय ने एक निजी इमारत की पहली मंजिल पर जगह हासिल की है, लेकिन उसे पुस्तकालय के रूप में तैयार करने के लिए आवश्यक धन जुटाना बाकी है। जमीन अपने नाम पर नहीं होने के कारण स्थानीय निकायों से सहायता हासिल करने में भी कठिनाई आ रही है। इसके बावजूद ग्रामीण पुस्तकालय को स्थायी ठिकाना देने के प्रयास में जुटे हैं। उनका उद्देश्य है कि आने वाली पीढ़ियों को भी किताबों, सामूहिक अध्ययन और मार्गदर्शन के माध्यम से बेहतर भविष्य बनाने का अवसर मिले। थेत्तमाला की यह कहानी बताती है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े भवन या भारी संसाधनों की जरूरत नहीं होती। कभी-कभी एक छोटा-सा कमरा, कुछ किताबें और समाज के लिए कुछ करने का संकल्प ही पूरे गांव के भविष्य की दिशा बदलने के लिए पर्याप्त होते हैं।