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संत लिखमीदास महाराज के संदेशों से प्रेरित माली समाज: त्योहारों और सामाजिक आयोजनों के माध्यम से नई पीढ़ी को जोडऩे का प्रयास

जयंती, भजन संध्या और सेवा कार्यों के जरिए जीवंत रखी जा रही सांस्कृतिक पहचान

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हुब्बल्ली में संत लिखमीदास महाराज जयंती के अवसर पर एकत्रित माली समाज के लोग।

हुब्बल्ली में संत लिखमीदास महाराज जयंती के अवसर पर एकत्रित माली समाज के लोग।

भक्ति, सेवा और सादगी के मूल्यों को जीवन में उतार रहे
कर्नाटक के हुब्बल्ली-धारवाड़ जैसे आधुनिक शहर में भी माली समाज राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हुए आगे बढ़ा रहा है। संत लिखमीदास महाराज के आदर्शों को आधार बनाकर समाज भक्ति, सेवा और सादगी के मूल्यों को जीवन में उतार रहा है। संत लिखमीदास महाराज माली समाज के प्रमुख संत माने जाते हैं। उनके उपदेश आज भी समाज को एकता, सद्भाव और सेवा का मार्ग दिखाते हैं। यही कारण है कि माली समाज उन्हें अपनी आस्था का केंद्र मानते हुए हर वर्ष उनकी जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाता है।

धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन
हुब्बल्ली-धारवाड़ में माली समाज के करीब 30 परिवार निवास करते हैं, जिनकी जड़ें राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र बालोतरा, बाड़मेर, जालोर, सिरोही और जोधपुर से जुड़ी हैं। व्यापार और रोजगार के लिए यहां बसे इन परिवारों ने अपनी सांस्कृतिक पहचान को मजबूत बनाए रखा है। समस्त माली समाज हुब्बल्ली-धारवाड़ संगठन के माध्यम से समाज एकजुट होकर धार्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन करता है। संत लिखमीदास महाराज जयंती के अवसर पर संत की तस्वीर स्थापित कर पूजा-अर्चना, महाआरती और महाप्रसादी का आयोजन किया जाता है। इस दिन समाज के लोग अपने प्रतिष्ठान बंद रखकर सामूहिक रूप से कार्यक्रम में भाग लेते हैं। शाम को आयोजित भजन संध्या में स्थानीय कलाकार भक्ति गीतों के जरिए संत के संदेशों का प्रसार करते हैं, जिससे वातावरण भक्तिमय बन जाता है।

समाज सेवा कार्यों में सक्रिय भूमिका
संत के उपदेशों से प्रेरित होकर समाज सेवा कार्यों में भी सक्रिय भूमिका निभाता है। जयंती पर प्राप्त चढ़ावे की राशि गौशाला को समर्पित की जाती है। इसके अलावा बाबा रामदेव मेले में सेवा, पैदल संघ में भागीदारी और भाद्रवा बीज के अवसर पर सहयोग समाज की प्रमुख गतिविधियों में शामिल हैं। राजस्थान से आने वाले समाजबंधुओं का सम्मान करना भी यहां की परंपरा का हिस्सा है, जो आपसी भाईचारे को मजबूत करता है। समाज के वरिष्ठ सदस्य युवाओं को सांस्कृतिक जड़ों से जोडऩे के लिए निरंतर प्रयासरत हैं, जिससे नई पीढ़ी भी परंपराओं को समझे और आगे बढ़ाए। करीब 60 वर्ष पूर्व शंकर माली के हुब्बल्ली आगमन से शुरू हुई यह यात्रा आज एक सशक्त सामाजिक पहचान बन चुकी है। समाज के लोग विभिन्न व्यवसायों में सक्रिय रहते हुए भी अपनी संस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं।

अपनी जड़ों को नहीं भूले
सतीश माली कहते हैं, हम यहां रहकर भी अपनी जड़ों को नहीं भूले हैं। हर आयोजन के माध्यम से राजस्थानी संस्कृति को जीवित रखने का प्रयास करते हैं। नई पीढ़ी को परंपराओं से जोडऩा हमारी जिम्मेदारी है, इसलिए उन्हें हर कार्यक्रम में शामिल करते हैं।

सेवा, भक्ति और संस्कृति
धर्मेन्द्र माली कहते हैं, संत लिखमीदास महाराज जयंती हमारे लिए समाज को एकजुट करने का सबसे बड़ा अवसर है। सेवा, भक्ति और संस्कृति इन्हीं मूल्यों पर समाज को आगे बढ़ा रहे हैं।