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राजस्थान दिवस पर विशेष: अपनी जन्मभूमि से जुड़े हैं प्रवासी, राजस्थान में सहयोग के लिए रहते हैं सदैव तत्पर

राजस्थान की समृद्ध संस्कृति रही हैं वहीं इसका गौरवशाली इतिहास रहा है। अपनी वीरता व दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ ही अनूठी संस्कृति के लिए राजस्थान को जाना जाता है। हर साल 30 मार्च को राजस्थान दिवस मनाया जाता है। अपनी उद्यमिता से राजस्थानी देश की प्रगति में अहम सहभागी बने हैं। भारत को विकसित बनाने की दिशा में राजस्थान के लोगों का सक्रिय और सराहनीय योगदान रहा है।

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कर्नाटक में गणगौर का पर्व मनाती प्रवासी महिलाएं।

कर्नाटक में गणगौर का पर्व मनाती प्रवासी महिलाएं।

प्राकृतिक सौंदर्य में भी राजस्थान अद्वितीय है। यहां के पर्यटन स्थल, वन्यजीव अभयारण्य, अद्भुत स्थापत्य कला वाले किले और हवेलियां तथा थार का रेगिस्तान दुनिया भर से पर्यटकों को आकर्षित करता हैं। शौर्य और साहस ही नहीं बल्कि हमारी धरती के सपूतों ने हर क्षेत्र में कमाल दिखाकर देश-दुनिया में राजस्थान के नाम को ऊंचा किया हैं। यहां की कला संस्कृति तथा व्यापार इनकी अनूठी विशेषताएं हैं। राजस्थान की धरती पर रणबांकुरों ने जन्म लिया है। यहां वीरांगनाओं ने भी अपने त्याग और बलिदान से मातृभूमि को सींचा है। इसे पहले राजपूताना के नाम से जाना जाता था तथा कुल 19 रियासतों को मिलाकर यह राज्य बना तथा इसका नाम राजस्थान किया गया।

हर क्षेत्र में आगे रहे हैं राजस्थानी
राजस्थान हमारी जन्मभूमि है तथा कर्नाटक हमारी कर्मभूमि। राजस्थानी दोनों प्रदेशों के बीच तालमेल बिठाते हुए बिजनस को आगे बढ़ा रहे हैं। बिजनस के लिहाज से यहां का शांत माहौल भी उनके लिए काफी मददगार बन रहा है। शिक्षा, चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान के लिए राजस्थानी लगातार आगे रहते हैं। राजस्थान के लोगों के बारे में ऐसा भी अक्सर कहा जाता है कि राजस्थान के लोग जहां भी जाते हैं वे वहां के स्थानीय लोगों के सात मिश्री की तरह घुल-मिल जाते हैं। यह गुण राजस्थानियों में कूट-कूट कर भरा है। यहां सभी धर्मों और संप्रदायों के लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं और एक-दूसरे के त्योहारों को साथ-साथ मनाते हैं।

नई पौध को राजस्थानी से जोडऩे की दरकार
कर्नाटक में भी राजस्थान मूल के लोगों के कई संगठन बने हुए हैं। समाज स्तर पर भी कई संगठन है। ऐसे में इन संगठनों के माध्यम से कला व संस्कृति को आगे ले जाने की दिशा में किए जा रहे प्रयास सराहनीय है। हालांकि नई पीढ़ी मारवाड़ी या राजस्थानी भाषा को भूल रही है। ऐसे में नई पौध को इससे जोडऩे के प्रयास किए जाने की जरूरत है। बात यदि पहनावे की की जाएं तो राजस्थानी लोगों का एक अलग पहनावा रहा है। हालांकि यह अलग बात है कि पाश्चात्य सभ्यता के चलते हमारा परम्परागत पहनावा पीछे छूटता जा रहा है। अब केवल शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार या अवसर विशेष तक सीमित रह गया।

राजस्थान के विकास में प्रवासियों का योगदान सराहनीय
श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ हुब्बल्ली के अध्यक्ष उकचन्द बाफना मोकलसर कहते हैं, राजस्थान की मेहमाननवाजी और अपणायत का हर कोई कायल है। हर विपदा के समय राजस्थान के लोग सदैव अग्रिम पंक्ति में नजर आते हैं। सर्वधर्म समभाव की मिसाल राजस्थान में देखने को मिलती है। राजस्थान का अपना अलग इतिहास रहा है। राजस्थान के विकास में प्रवासियों का योगदान सराहनीय रहा है। वे अपनी जड़ों से भी जुड़े हुए हैं। अपनी परम्परा एवं रीति-रिवातों को बनाए रखने की दिशा में भी लगातार प्रयासरत है। राजस्थान में स्कूल, अस्पताल एवं अन्य स्थलों केे निर्माण में भी प्रवासियों ने सदैव योगदान दिया है। गौशालाओं में भी प्रवासी समय-समय पर सहयोग देते रहे हैं। राजस्थान के समदड़ी में बने ज्येष्ठ धाम में भी प्रवासियों का सहयोग रहा है। ऐसे में प्रवासी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। कई शादी-ब्याह भी अब राजस्थान में होने लगे हैं। इस तरह राजस्थान से जुड़ाव गहरा हो रहा है।