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श्रद्धा व उत्साह के साथ मनाई गई लोक देवता देवनारायण भगवान की जयंती

भगवान विष्णु के अवतार माने जाने वाले लोक देवता देवनारायण भगवान की जयंती हुब्बल्ली में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाई गई। इस अवसर पर गुर्जर समाज उत्तर कर्नाटक की मेजबानी में विविध धार्मिक आयोजन संपन्न हुए, जिनमें समूचे उत्तर कर्नाटक सहित विभिन्न शहरों से गुर्जर समाज एवं प्रवासी समाज के लोगों ने भाग […]

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हुब्बल्ली में देवनारायण जयंती के अवसर पर मौजूद गुर्जर समाज के लोग।

हुब्बल्ली में देवनारायण जयंती के अवसर पर मौजूद गुर्जर समाज के लोग।

भगवान विष्णु के अवतार माने जाने वाले लोक देवता देवनारायण भगवान की जयंती हुब्बल्ली में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाई गई। इस अवसर पर गुर्जर समाज उत्तर कर्नाटक की मेजबानी में विविध धार्मिक आयोजन संपन्न हुए, जिनमें समूचे उत्तर कर्नाटक सहित विभिन्न शहरों से गुर्जर समाज एवं प्रवासी समाज के लोगों ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान देवनारायण भगवान की तस्वीर के समक्ष विधिवत पूजा-अर्चना की गई। भजन संध्या में श्रद्धालु भक्ति भाव में झूमते नजर आए। आयोजकों ने बताया कि गुर्जर समाज एवं सर्व समाज के श्रद्धालु प्रतिवर्ष माघ मास के शुक्ल पक्ष की सूर्य सप्तमी को पूरे देश में देवनारायण जयंती धूमधाम से मनाते हैं।

गायों की रक्षा का संदेश
गुर्जर समाज उत्तर कर्नाटक के पदाधिकारियों ने कहा कि भगवान देवनारायण को गोरक्षक, असहायों के दु:ख हरने वाले लोक देवता एवं पराक्रमी योद्धा के रूप में पूजा जाता है। राजस्थान सहित अन्य राज्यों में भी विभिन्न समाजों के श्रद्धालु उनकी आराधना करते हैं। देवनारायण महागाथा में बगड़ावतों एवं राण भिणाय के शासक के बीच हुए युद्धों का रोचक वर्णन मिलता है। भगवान देवनारायण का अंतिम समय ब्यावर तहसील के मसूदा के निकट देहमाली स्थान पर बीता, जहां भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को उनका देहावसान हुआ।
कृष्ण की भांति देवनारायण भी गायों के रक्षक थे। उनके पास 98 हजार पशुधन बताया जाता है। जब राण भिणाय का राणा उनकी गायों को ले जाता था, तब देवनारायण युद्ध कर गायों को छुड़ाते थे। उनकी सेना में 1444 ग्वाले थे। उन्होंने अपने अनुयायियों को गायों की रक्षा का संदेश दिया।

देवनारायण की स्मृति में डाक टिकट

गुर्जर समाज के लोगों ने जानकारी दी कि राजस्थान में विभिन्न स्थानों पर भगवान देवनारायण के देवालय स्थापित हैं, जिन्हें देवरा कहा जाता है। उनका प्रमुख मंदिर भीलवाड़ा जिले के आसींद कस्बे के निकट खारी नदी के तट पर स्थित है। देवनारायण की पूजा भोपा समुदाय द्वारा की जाती है, जो चित्रित फड़ के माध्यम से गाथा का गायन करते हैं। देवनारायण की फड़ में 335 गीत, लगभग 1200 पृष्ठ और करीब 15 हजार पंक्तियां शामिल हैं, जो भोपाओं को कंठस्थ रहती हैं। यह राजस्थान की सबसे लोकप्रिय और विशाल फड़ मानी जाती है। भगवान देवनारायण की स्मृति में 2 सितंबर 1992 और 3 सितंबर 2011 को पांच रुपए मूल्यवर्ग के स्मारक डाक टिकट भी जारी किए गए थे।