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100 साल पुराना धर्मराज का मंदिर गिरा, लेकिन प्रतिमा व ध्वजा सुरक्षित

बदनावर में लगातार हो रही बारिश से सुबह 5 बजे हुई घटना के बाद भगवान के दर्शन को उमड़ी भीड़

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इंदौर

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Amit Mandloi

Aug 23, 2018

badnawar

100 साल पुराना धर्मराज का मंदिर गिरा, लेकिन प्रतिमा व ध्वजा सुरक्षित

बदनावर में लगातार हो रही बारिश से सुबह 5 बजे हुई घटना के बाद भगवान के दर्शन को उमड़ी भीड़

बदनावर. बलवंती नदी के समीप 100 साल पुराना धर्मराज मंदिर बुधवार सुबह 5 बजे भरभराकर गिर गया। यहां कायस्थ समाज के कुलदेवता धर्मराज की प्रतिमा स्थापित थी। प्रतिमा को खरोंच भी नहीं आई। शिखर टूटकर गिर गया, लेकिन ध्वज लहराता रहा। इसके बाद तो वहां भगवान के दर्शन के लिए लोगों की भीड़ जमा होने लगी।
मंदिर निर्माण रावला ठिकाने द्वारा कराया गया था। ईंट-चूने से दो हिस्सों में मंदिर स्थापित था। आगे सभागृह एवं पीछे धर्मराज प्रतिमा के साथ जलाधारी, पार्वती, नंदेश्वर की प्रतिमा स्थापित थी। हादसे में स्थापित प्रतिमा वाला हिस्सा ढह गया।
प्रत्यक्षदर्शी महादेवपुरी गोस्वामी ने बताया कि प्रतिदिन की भांति मंदिर परिसर में पूजा के लिए फूल तोडऩे आए थे। मंदिर से मात्र 10 फीट की दूरी पर लगे पौधे से फूल तोड़ ही रहे थे कि अचानक जोरदार धमाका हुआ। पूरा शरीर धूले में हो गया। कुछ देर तो समझ ही नहीं आया। फिर देखा कि मंदिर धराशायी हो गया है, तो बाहर आकर लोगों को बताया। इस बीच बड़ी संख्या में लोग जमा हो गए थे।
पीपल के पेड़ की जड़ों के कारण मंदिर हुआ ध्वस्त : मंदिर में स्थापित प्रतिमा के पीछे की दीवार के पास पीपल के पेड़ के गिरने से यह घटना होना बताई जा रही है। पेड़ की जड़े फैलकर स्थापित धर्मराज की प्रतिमा के सिंहासन के नीचे तक फैल गई थीं। पेड़ के पीछे की तरफ गिर जाने से मंदिर का पिछला हिस्सा ध्वस्त हो गया। मंदिर का मलबा भी इस प्रकार बिखरा कि प्रतिमा स्पष्ट नजर आ रही थी। गौरतलब है कि मंदिर निर्माण एवं परिसर सौंदर्यीकरण के लिए धर्मस्व विभाग द्वारा 27 लाख रुपए विधायक की अनुसंशा पर स्वीकृत किए गए हैं।

श्रीगणेश मंदिर का शिखर भी टूूटा: मंदिर परिसर में श्रीगणेश मंदिर, हनुमान मंदिर एवं समाधि भी स्थित है। परिसर में ही व्यायामशाला भी संचालित होती है। हादसे के दौरान श्रीगणेश मंदिर के शिखर से बिजली का तार बंधा होने से श्रीगणेश मंदिर का शिखर भी टूूटकर नीचे गिर गया। शादी-ब्याह के दौरान ढोल-धमाके के साथ परिवार की महिलाएं यहां आती हैं एवं जुवार की घुघरी, तिल एवं गुड़ यहां बैठकर खाने एवं पूजा-अर्चना की परंपरा निभाती हैं।