
मनीष यादव
इंदौर. वर्ष 1947... बात उन दिनों की है, जब करीब डेढ़ सौ बरस की दासता से हमारा देश आजाद हुआ था। अंग्रेजों की गुलामी के दिनों से लेकर आजाद भारत तक देखने वाले कुछ बजुर्ग आज भी हमारे बीच हैं। उम्र के साथ उनकी स्मृति और शरीर जरूर कुछ कमजोर पड़ा है, लेकिन आजादी की वो लड़ाई, वो दौर उन्हें याद है। उसे याद करते ही उनकी आंखों में एक चमक-सी दिखाई देती हैं। उन्हें गर्व है कि हमने गुलामी की जंजीरों को टूटते और देश को आजाद होते देखा है। ऐेसे ही कुछ लोगों से पत्रिका ने बात की।
जश्न मना तो पता चला, हम आजाद हो गए
खाती मोहल्ला के अमर सिंह चौधरी ने कहा कि मैं तब 25 बरस का था, पहले इतने अखबार और सूचना के साधन नहीं होते थे। इसके चलते खबरें काफी देरी से पहुंचती थी। देश आजाद होने वाला है, यह कुछ दिनों से सुनते आ रहे थे। 15 अगस्त को जब स्वतंत्रता मिली तो पहले पता नहीं था। जब लोगों को जश्न मनाते देखा तो उनसे इस बारे में पूछा। पता चला कि हम आजाद हो गए हैं। उस वक्त खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उस खुशी को शब्दों में बयां कर पाना मुश्किल है। अंग्रेजों के जुल्मोसितम से अब हम मुक्त हो चुके थे। घर आकर सभी को बताया और फिर जो भी साधन उस वक्त मिले, उसके साथ जुलूस निकाला, मिठाइयां बांटी।
मशाल लेकर निकल पड़े
मोती तबेला के भोलाराम यादव ने कहा कि मैं तब हुकुमचंद मिल में काम करता था। 14 अगस्त को रोज की तरह ड्यूटी पर गया। वहां पता चला कि हम आजाद हो गए हैं। मिल के अंदर मिठाई बनना शुरू हो गई। मजदूरों ने तय किया कि वे मशाल रैली निकालेंगे। उन्हें इसके लिए बांस का इंतजाम करने की जिम्मेदारी दी गई। बांस इकट्ठा कर मशालें बनाई गईं। इसके बाद सभी मजदूर मशाल लेकर मिल से राजबाड़ा तक पहुंचे। वहां पर सभा हुई। मिठाई बांटी गई। घर भी मिठाई लेकर आए और रात में ही परिवार के लोगों को उठाकर मिठाई खिलाई, उन्हें बताया कि हम आजाद हो गए। अगले दिन कोई भी काम नहीं किया। हर तरफ सिर्फ जश्न-ए-आजादी का माहौल था। 15 अगस्त का वो दिन खुशी मनाते हुए निकल गया।
सोए तो गुलाम थे, जागे आजाद
खाती मोहल्ला इंदौर की पार्वती बाई ने बताया कि देश आजाद होने पर क्या किया, कैसा जश्न मना यह तो ज्यादा याद नहीं है लेकिन सुबह सोकर उठे तो पता चला कि हम आजाद हो गए। उस वक्त लगभग 30 साल का था। सभी के चेहरों पर आई खुशी आज भी याद है। हर कोई बता रहा था कि अंग्रेज चले गए हैं। वह दौर अच्छे से देखा है, जब अंग्रेज जुल्म ढहाते थे। रेसीडेंसी कोठी में जिला कलेक्टर रहा करते थे। उस वक्त आसपास के लोग जो जूते पहनते थे, वो आवाज किया करते थे। कोठी के सामने से वे जब निकलते तो गेट पर तैनात संत्री उनको जूते उतारकर हाथों में उठाने के लिए बोलता। इसी तरह आगे एक किलोमीटर तक नंगे पैर रास्ता तय करना पड़ता, क्योंकि जूतों की आवाज से अंग्रेज अफसर की नींद खुल जाती थी। अगर कोई जूते पहनकर निकलता तो उसकी बेदर्दी से पिटाई की जाती थी।
हमारा भी 75वां जन्मदिन
सेवानिवृत्त शिक्षक देवकृष्ण सेन ने बताया कि मैं खुशनसीब हूं कि मेरा जन्म वर्ष 1947 में हुआ। मेरे जन्म के कुछ दिनों बाद ही भारत आजाद हो गया। मेरे लिए तो यह बड़े गर्व की बात है कि उस वर्ष जन्मा। देश की स्वतंत्रतता को जितने वर्ष हुए, उतने ही हमें भी हो गए। हमें यह भूलना नहीं चाहिए कि महान क्रांतिकारियों के बलिदान के कारण ही हम आज आजादी से सांस ले पा रहे हैं। पहले देश, बाकी सब दूसरे स्थान पर आता है। देशभक्तों ने आजादी दिला दी। 75 वर्षों में देश में काफी बदलाव आए हैं। कुछ अच्छे तो कुछ बुराइयां भी आ रही हैं। इन बुराइयों को दूर कर देश को आगे ले जाना है। हमें हमारे पूर्वजों के सपने को सच कर देश को विश्वगुरु बनाना है, तब ही उन बलिदानियों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
Published on:
15 Aug 2022 01:47 pm
बड़ी खबरें
View Allइंदौर
मध्य प्रदेश न्यूज़
ट्रेंडिंग
