13 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

VIDEO : अनंत चतुर्दशी चल समारोह में रौंगटे खड़े कर देगा इन कलाकारों का हैरतंगेज प्रदर्शन

- चल समारोह में प्रदर्शन के लिए सालभर व्यायामशालाओं में करते हैं तैयारी, दिन-रात बहाते हैं पसीना

5 min read
Google source verification

इंदौर

image

Hussain Ali

Sep 12, 2019

VIDEO : अनंत चतुर्दशी चल समारोह में रौंगटे खड़े कर देगा इन कलाकारों का हैरतंगेज प्रदर्शन

VIDEO : अनंत चतुर्दशी चल समारोह में रौंगटे खड़े कर देगा इन कलाकारों का हैरतंगेज प्रदर्शन

इंदौर. अनंत चतुर्दशी की झांकियों का कारवां शहर में कुछ ही देर में शुरू होने वाला है। इस एक दिन के प्रदर्शन के लिए शहर की व्यायामशालाओं में कलाकार रात-दिन मेहनत कर पसीना बहाते हैं। इनमें तीन साल के बच्चे से लेकर 60 साल के बुजुर्ग तक शामिल है। अखाड़ों में इनका प्रदर्शन देखकर हर कोई दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर हो जाता है ।

श्री चंद्रपाल उस्ताद व्यायामशाला : यहां के कलाकारों का कोई हाथ नहीं रोक पाता

मिट्टी की कुश्ती हो या आधुनिक रैसलिंग चंद्रपाल उस्ताद व्यायामशाला का नाम ही काफी है। इंदौर की शान यह अखाड़ा अपनी गुरु-शिष्य परंपरा को आज भी पूरे समर्पण से निभा रहा है।1932 में स्थापित इस अखाड़े में पुरातन शस्त्रकला के जानकार मौजूद हैं।?ये तलवार चलाने, भाला फेंकने, खाली हाथों से चाकू के हमलावर को रोकने और पलटवार करने जैसी कलाओं को नई पीढ़ी को सौंप रहे हैं।संचालक मनोज सोमवंशी अधिकांश समय बच्चों को तैयार करने में लगाते हैं। खलीफा माताप्रसाद प्रजापति बताते हैं, हमारे तैयार कलाकारों का आज भी कोई हाथ नहीं रोक पाता।

गुरुदास व्यायामशाला, बड़ा गणपति : गुरु नाम को आगे बढ़ाने में जुटा है यह अखाड़ा

बड़ा गणपति मंदिर के पास दास हनुमान और जय-जय सियाराम बाबा के गुरुनाम के साथ संचालित होने वाले इस अखाड़े में बच्चे शस्त्रकला का अभ्यास शास्त्रों का ज्ञान, रामायण और हनुमान चालिसा के पाठ के साथ शुरू करते हैं। यहां इंदौर ही नहीं देपालपुर के गांवों के बच्चे भी आते हैं।?इस अखाड़े में गुरुपूर्णिमा पर गुरुपूजन के साथ ही शस्त्रकला का अभ्यास शुरू कर दिया जाता है। हम गुरु के नाम को आगे बढ़ाने में जुटे हैं। हम चंदा नहीं करते हैं, बल्कि जो भी हमारी मदद करता है उससे ही इस अखाड़े को चलाते हैं। हमारे पास कोई जमीन नहीं है, खुले में ही हम अभ्यास करते हैं।

देवीदीन व्यायामशाला, नौलखा : होलकर सैनिकों भी यहीं से सीखते थे शस्त्रकला

पूर्वी क्षेत्र में मौजूद यह अखाड़ा शहर के प्राचीन अखाड़ों में से एक है। यहां होलकर सैनिकों को भी शस्त्रकला की शिक्षा दी जाती थी। चल समारोह में पिछले ८७ वर्षों से यह अखाड़ा अपनी प्रस्तुति दे रहा है। कल्याण मिल की पहली झांकी के समय यह अखाड़ा मिल की झाकियों का नेतृत्व करते हुए सबसे आगे चला था। नौलखा स्थित हार्डिया कंपाउंड में मौजूद इस अखाड़े ने मिट्टी की कुश्ती क कई पहलवान तो दिए ही हैं। यहां से कई बच्चे भी शस्त्रकला की बारीकियां सीख कर शहर का नाम रोशन कर रहे हैं। संचालक राजीव हार्डिया बताते हैं हमारी पांचवी पीढ़ी अब इस परंपरा को लेकर झांकियों के साथ निकल रही है।

गुरु चिमनराव उस्ताद व्यायामशाला : अभावों में भी परंपरा को जिंदा रखने की कोशिश

मिल मजदूरों की बस्ती कुलकर्णी का भट्टा में मौजूद यह पुराना अखाड़ा अभावों के बाद भी परंपराओं को जिंदा रखने की कोशिशों में जुटा है। अखाड़े के पास इतनी भी जमीन नहीं है कि वो बिल्डिंग बना सके। यहां के कलाकार कल्याण मिल की खाली जमीन पर प्रैक्टिस करते हैं। लगातार बारिश के कारण इस बार ये सडक़ पर ही तैयारी करने के लिए मजबूर हैं। स्ट्रीट लाइट में अपनी शस्त्रकला को जिंदा रखने की कोशिश में जुटे इस अखाड़े में कई बच्चे शस्त्रकला सीख रहे हैं।?संचालक सुभाष शिंदे बताते हैं, हमारा उद्देश्य बच्चों और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। हम झांकियों के साथ चलने के लिए नहीं बल्कि जनता को प्राचीन परंपरा से जोडऩे के लिए निकलते हैं।

हीरालाल उस्ताद व्यायामशाला: शस्त्रकला की शान रहा यह अखाड़ा सरकारी तंत्र से खफा

कई बार अपनी शस्त्रकला में प्रथम स्थान पाने वाला हीरालाल उस्ताद व्यायामशाला का अखाड़ा इस बार अनंत चतुर्दशी के जुलूस में शामिल नहीं होगा। अखाड़े के संचालक अफसरों की मनमर्जी से इतने नाराज हैं कि उन्होंने अखाड़े को निकालने से ही मना कर दिया।?मिल क्षेत्र की शान कहलाने वाला यह अखाड़ा अपनी शस्त्रकला के लिए पूरे प्रदेश में पहचाना जाता था। इसकी एक शाखा तो शस्त्रकला केंद्र के रूप में ही विख्यात है।

अनंत चतुर्दशी के दो माह पहले से ही अखाड़े में कलाकारों को शस्त्रों की चलाना, उनकी काट करना, बंदिश सीखाना शुरू कर दिया जाता था। शाम के समय यहां पर कलाकारों का जमघट लगता था। इस बार झांकी निकलने के एक दिन पहले तक अखाड़े में सन्नाटा पसरा है। संचालक रमेश (उस्ताद) यादव जुलूस में प्रशासनिक अफसरों के रवैये से नाराज हैं। उनका कहना है पहले अखाड़ों को करतब दिखाने का पूरा मौका दिया जाता था। 90 साल से जुलूस में हथियारों को लेकर अखाड़े निकलते रहे हैं, लेकिन शस्त्रों के जरिए कभी कोई घटना नहीं हुई। लेकिन अब प्रशासन शस्त्रों के नाम पर केवल पटा और बाना लेकर ही चलने की अनुमति देता है। जब अखाड़े शस्त्रों को ही लेकर नहीं निकलेंगे तो वे भारतीय शस्त्रकला क्या है, कैसे बता पाएंगे। पहले निर्णायक मंच पर शस्त्रकला जानने वाले लोग बैठते थे, उन्हें पता होता था पटे की काट क्या होती है। लेकिन अब जो बैठते हैं उन्हें कोई जानकारी ही नहीं होती पर वे इनाम तय करते हैं। शस्त्रकला शुरू करने के पहले पैतरों को दिखाने मे ही तीन मिनट लग जाते हैं, लेकिन अब उतने समय में पूरा प्रदर्शन करना होता है। वहीं पुलिस और प्रशासन के अफसर झांकियों को तेजी से निकालने के चक्कर में अखाड़ों के कलाकारों यहां तक की उस्ताद खलिफाओं का भी अपमान करने से नहीं चूकते। ऐसे में हम अपनी कला और साथियों का अपमान करना नहीं चाहते। इसलिए अखाड़ा नहीं उठाएंगे।

इन नन्हे उस्तादों से है बड़ी उम्मीदें

कृष्णा पाल : गुरूदास व्यायाम शाला में शस्त्रकला की बारिकियां सीख रहा ये नन्हा कलाकार बीमारी से भी लड़ रहा है। उसे लीवर से जुड़ी बीमारी है, लेकिन उसके बाद भी शस्त्रकला की बारिकियों को सीखने के साथ ही उसे खेलने में वो पूरी ताकत लगा देता है।

तमन्ना ठाकुर : बीते दो सालों से चंद्रपाल उस्ताद व्यायामशाला में शस्त्रकला सीख रही तमन्ना बनेठी की प्रेक्टिस करती है। 7 साल की छोटी सी उम्र में ही बनेठी के साथ वो इस तरह के करतब कर जाती है जो बड़े-बड़े कलाकारों के लिए भी करना मुश्किल होता है।

अवनि प्रमोद हार्डिया : देवीदिन व्यायामशाला में प्रेक्टिस करने वाली पांच साल की अवनि अभी शस्त्रकला को सीख ही रही है। उसका खुद का शस्त्रकला से इतना लगाव है कि अपने भाइयों को प्रेक्टिस करते देख वो भी बनेठी चलाने लग गई है। उसने बनेठी चलाना अभी पूरी तरह सीखा नहीं है, लेकिन बावजूद इसके वो इतनी सफाई के साथ बनेठी घूमाती है कि देखने वाले उसे देखते रह जाते हैं।