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मुसलमान क्यों मनाते हैं बकरीद और क्यों दी जाती है कुर्बानी

इस साल बकरीद 2 सितंबर को मनाई जाएगी।

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इस साल बकरीद 2 सितंबर को मनाई जाएगी। इस्लामिक कैलेंडर के मुताबिक ईद उल जुहा 12वें महीने धू अल हिज्जा के दसवें दिन मनाई जाती है। इस्लाम धर्म में 5 फर्ज माने गए हैं जिनमें से हज आखिरी फर्ज माना गया है। माना जाता है कि हर मुसलमान को जीवन में एक बार हज करना जरूरी है। इस्लाम में ईद का बहुत महत्व है। हर साल 2 ईद मनाई जाती है। एक ईद उल फितर और दूसरी ईद उल जुहा। 2 सितंब को भारत में ईद उल जुहा मनाई जाएगी। हज होने की खुशी में ही ईद-उल-जुहा का त्योहार मनाया जाता है। इसे कुर्बानी का पर्व भी कहते हैं। बकरीद के दिन अपनी सबसे प्रिय चीज की अल्लाह को कुर्बानी देना होती है। इस दिन बकरे, भैंस या कुछ जगहों पर ऊंट की भी कुर्बानी दी जाती है।

जिस तरह से भारत में हिन्दुओं के लिए दीपावली का, सिखों के लिए प्रकाश वर्क का और क्रिश्चियनों के लिए क्रिसमस का महत्व है ठीक उसी तरह से मुसलमानों के लिए बकरीद का महत्व है। रमजान महीने के खत्म होने के लगभग 70 दिन के बाद बकरीद को मनाया जाता है। बकरीद के दिन मुस्लिम समुदाय भारत में अधिकांश जगहों पर बकरों की कुर्बानी देता है। कुर्बानी के लिए बकरे को पाला पोसा जाता है और उसकी खूब खिलाई पिलाई की जाती है। इसके बाद बकरीद के दिन अल्लाह के लिए उसकी कुर्बानी दे दी जाती है। कुर्बानी के गोश्त को 3 हिस्सों में बांटते हैं। 1 हिस्सा कुर्बानी करने वाले खुद के घर में रखते हैं और 2 हिस्से बांट देते हैं। बकरीद की नमाज पढऩे के बाद कुर्बानी दी जाती है। यह कुर्बानी 3 दिन तक दी जा सकती है। माना जाता है कि बकरीद पर कुर्बानी देना शबाब का काम होता है।

क्या है कहानी
हजरत इब्राहिम अपने बेटे हजरत इस्माइल को आज ही के दिन खुदा के लिए कुर्बान करने जा रहे थे। वे अपने बेटे को ऐसी हालत में देख नहीं पा रहे थे इसलिए उन्होंने कुर्बानी के वक्त अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। खुदा के आदेशानुसार जैसे ही उन्होंने बेटे की कुर्बानी दी उनके बेटे की जगह एक जानवर आ गया। उन्होंने पट्टी खोली तो बेटा सुरक्षित था। अल्लाह उनकी भावना से इतना प्रभावित थे कि उन्होंने उनके बेटे को जीवनदान दे दिया। तब से इस घटना की याद में यह त्योहार मनाया जाने लगा।