
लोकसभा चुनाव को देख बचे भाजपा के 'विभीषण'
इंदौर। खुद को अनुशासित बताने वाले भाजपा अब लाचार दिखाई दे रही है। विधानसभा चुनाव में खुलकर भीतरघात करने वालों की मय प्रमाण के भी शिकायत कर दी गई, लेकिन उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। इशारों में समझा दिया गया कि कार्रवाई की तो लोकसभा चुनाव में पार्टी को नुकसान होगा। अभी शांति बनाए रखें, मौका आने पर सभी का हिसाब कर दिया जाएगा।
भाजपा का दावा है कि वह विश्व का सबसे बड़ा राजनीतिक दल है, जिसमें अनुशासन सर्वोपरि है। इस विधानसभा चुनाव में ये बात कोरी झूठ साबित हो रही है। इंदौर की अधिकतर सीटों पर भाजपाइयों ने खुलकर पार्टी प्रत्याशी की बैंड बजाई। उसमें सबसे पहला नाम एक नंबर विधानसभा का है, जिसमें राष्ट्रीय कवि व वरिष्ठ नेता सत्यनारायण सत्तन, विष्णुप्रसाद शुक्ला, राजेंद्र शुक्ला सहित कुछ पार्षद व पूर्व पार्षद हैं।
वहीं नेता व कार्यकर्ताओं के नामों की तो फेहरिस्त है। उसी प्रकार तीन नंबर, चार नंबर, पांच नंबर, राऊ के साथ सांवेर में भी कई दिग्गज नेताओं के नाम हैं, जिन्होंने अपने प्रत्याशियों को हराने के लिए खुलकर कार सेवा की। जो हर बार कांग्रेस में होता था, वह इस बार भाजपा में हुआ और उससे भी भयानक रूप में।
भाजपा में हमेशा से विभीषणों पर सख्त कार्रवाई होती रही है, लेकिन इस बार संगठन मौन है।
पहले तो लिखित में शिकायत मांगी जा रही थी, बाद में कुछ नेताओं के तो जवाबदारों ने सबूत तक दे दिए। उसके बावजूद संगठन लाचार नजर आ रहा है। विधानसभा परिणाम तो ठीक अब उसे लोकसभा की चिंता सताने लग गई है। पार्टी उन कलाकारों को निकालने के मूड में नहीं है।
उन्हें मालूम है कि जैसे ही भगाया वैसे ही ये विरोधियों के साथ जाकर खड़े हो जाएंगे। ऐसे में और ज्यादा घातक होंगे, पार्टी का बड़ा नुकसान करेंगे। इसी सोच के चलते सभी भितरघातियों को छोड़ा जा रहा है। हालांकि संगठन ने आश्वासन दिया है कि भविष्य में सभी का विशेष ध्यान रखा जाएगा।
मौका आने पर ध्यान देकर उन्हें महत्वपूर्ण जवाबदारी से वंचित रखा जाएगा। गौरतलब है कि चुनाव में पार्टी से ग²ारी करने वाले कुछ नेता तो ऐसे हैं, जो आदतन हैं। पिछले कई चुनाव से वे पार्टी के प्रत्याशी को हराने में जुट जाते हैं। इस फेहरिस्त में एक नंबर विधानसभा के कुछ नेताओं का नाम प्रमुख हैं।
खल रही धर्म-धारकर की कमी
भाजपा की स्थापना के समय से इंदौर भाजपा की गतिविधियों का केंद्र बिंदु रहा है। संगठन को मजबूत करने वाले कई दिग्गज नेता थे, जिनमें नारायणराव धर्म और राजेंद्र धारकर प्रमुख नाम थे। दोनों ही नेताओं को अनुशासनप्रिय माना जाता रहा है। चुनाव में बगावत करने वालों को वे बिलकुल नहीं बख्शते थे।
छह साल के लिए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा देते थे। उनका साफ मानना था कि आज इन्होंने किया और उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं की तो कल से दूसरा कार्यकर्ता वही करेगा। पार्टी में अनुशासन कहां बचेगा? बीमारी को जड़ से और तुरंत निपटाया जाए। फैलने पर ज्यादा घातक हो जाती है।
Published on:
19 Dec 2018 10:52 am
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