
बोन मैरो ट्रांसप्लांट: इंदौर के बाद भोपाल में तैयारी, प्रदेश में नहीं है सरकारी हेमाटोलॉजिस्ट
इंदौर. प्रदेश में कैंसर, थैलेसिमिया, सिकल सेल एनेमीया जैसी गंभीर बीमारियों के गरीब मरीजों के इलाज हेतु सरकार इंदौर के बाद भोपाल में बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट खोलने की तैयारी कर रही है। इसके लिए अमेरिका और गुडग़ांव के हेमाटोलॉजिस्ट डॉक्टर मदद कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय हेमाटोलॉजिस्ट को जोडऩा मुनासिब नहीं समझा गया। भविष्य के लिए डॉक्टर तैयार करने के लिए भी कोई कदम नहीं उठाए जा रहे।
गौरतलब है, तीन मार्च को एमवाय अस्पताल में तैयार यूनिट में पहला पहला ट्रांसप्लांट किया गया था। अब तक तीन ऑटोलोगस ट्रांसप्लांट किए गए हैं। साथ ही तीन थैलेसिमिया पीडि़त बच्चो का बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया है, एक बच्चे की प्रक्रिया जारी है। ऑटोलोगस ट्रांसप्लांट के लिए गुडग़ांव फोर्टिंस के एक्सपर्ट डॉ. राहुल भार्गव यहां आते हैं। अब भोपाल के कमला नेहरू अस्पताल में वह यूनिट स्थापित कराने में मदद कर रहे हैं, उनके निर्देशन में ही वहां यूनिट शुरू की जाएगी। इधर, थैलेसिमिया पीडि़त बच्चों के ट्रांसप्लांट के लिए न्यूयार्क के एक्सपर्ट डॉ. प्रकाश सतवानी मदद कर रहे हैं। उन्होंने एमजीएम मेडिकल कॉलेज की दो शिशुरोग विशेषज्ञ डॉ. प्रीति मालपानी और डॉ. प्राची चौधरी को अमेरिका में ६ माह की ट्रेनिंग दिलाई है। डॉ. सतवानी अमेरिका से ट्रांसप्लांट की निगरानी करते हैं और उनके द्वारा तैयार टीम यहां काम कर रही है।
इलाज हो रहा, लेकिन पढ़ाई नहीं
इंदौर और भोपाल के बाद अन्य सराकारी मेडिकल कॉलेजों में भी ट्रांसप्लांट यूनिट खोलने की बात कही जा रही है। हालांकि, हेमाटोलॉजिस्ट बनने के लिए डीएम कोर्स राज्य के किसी सरकारी व निजी मेडिकल कॉलेज में उपलब्ध नहीं है। इंदौर के एक निजी कॉलेज में ऑन्कोलॉजी में पीजी कोर्स चलाया जा रहा है। मेडिकल कउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के नियमों में ऑन्कोलॉजिस्ट भी ट्रेनिंग के बाद ट्रांसप्लांट करने के लिए पात्र हैं। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हेमाटोलॉजी कोर्स शुरू करने के लिए भी हेमाटोलॉजिस्ट डॉक्टर की प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति जरूरी है।
डॉक्टरों को नहीं दिला पा रहे भरोसा
हेमाटोलॉजी की पढ़ाई मुंबई, दिल्ली, चैन्नई जैसे ८-१० बड़े शहरों में ही हो रही है। एमबीबीएस, एमडी और फिर डीएम की महंगी और लंबी पढ़ाई के बाद डॉक्टर केरियर को ध्यान रखते हुए निजी क्षेत्र में ही नौकरी तलाशते हैं। प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में काफी कम वेतन के साथ बिगड़े ढर्रे के कारण एक्सपर्ट दूरी बना लेते हैं। अब सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बनाकर सरकार आकर्षक वेतन देने की बात कह रही है, लेकिन इसके लिए एक्सपर्ट डॉक्टर्स स्थानीय स्तर पर तैयार करने की जरूरत है।
वर्जन...
हम ऑनेररी सेवा देने को तैयार
हेमाटोलॉजिस्ट या अन्य एक्सपर्ट नियुक्त करने के लिए मेडिकल कॉलेजों का स्टेंडर्ड बढ़ाने की जरूरत है। हम भविष्य के डॉक्टर्स तैयार करने के लिए ऑनेररी सेवा बिना किसी फायदे के देने को तैयार हैं। कई बार कॉलेज जाकर लेक्चर लिए भी, लेकिन वहां का रवैया नकारात्मक रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई में ऐसे कोर्स शुरू करने के लिए ऑनेररी सिस्टम बनाया है। यहां ऐसी कोई पहल नहीं की गई। शिशुरोग विशेषज्ञों को ६-६ माह का कोर्स कराकर ट्रांसप्लांट के लिए तैयार करना अच्छी पहल है, लेकिन यह काम हेमाटोलॉजिस्ट की निगरानी में ही संभव है, ताकि कोई कॉम्पिलिकेशन हो तो मरीज को बचाया जा सके। बिना एक्सपर्ट के ट्रांसप्लांट तो किया जा सकता है, लेकिन सक्सेस रेट कम होता है, मरीज चाहे सक्षम हो या गरीब उसकी जान बचाना महत्वपूर्ण है।
डॉ. अनिल सिंघवी, हेमाटोलॉजिस्ट व ऑन्कोलॉजिस्ट इंदौर
डीएम कर रहे डॉक्टर से कर रहे चर्चा
जबलपुर मेडिकल विवि के पूर्व वीसी रहे प्रोफेसर के बेटे बेंगलुरु में हेमाटोलॉजी में डीएम कर रहे हैं। सितंबर माह में कोर्स पूरा हो जाएगा। उनसे चर्चा की गई है। वह भी इंदौर में ही प्रैक्टीस करना चाहते हैं। एमजीएम में बोन मैरो सेंटर के लिए नियुक्ति की जा सकती है। इसके बाद एमसीआई से कोर्स के लिए अनुमति मांग सकते हैं। अन्य विशेषज्ञ कोर्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल शुरू होने पर कॉलेज में उपलब्ध हो जाएंगें। स्थानीय डॉक्टर्स मदद करना चाहते हैं तो हम जरूर उनसे संपर्क करेंगें।
डॉ. शरद थोरा, डीन एमजीएम मेडिकल कॉलेज
Published on:
17 Aug 2018 04:16 am
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