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बूढ़ी मांडव – गुमनाम इतिहास की धरोहरों को फिर जिंदा करने की कोशिश

यहां करीब 250 से ज्यादा मूर्तियां, मंदिरों के खंडहर, टूटे शिखर, दीवारें, घाट आदि हैं जिनके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है।

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budhi mandav

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रुखसाना मिर्जा@ इंदौर. मांडव तो सभी का जाना-पहचाना है पर मांडव के पास ही है बूढ़ी मांडव की सुनसान पहाड़ी, जहां दूर-दूर तक बिखरा पड़ा है गुमनाम इतिहास। यहां करीब 250 से ज्यादा मूर्तियां, मंदिरों के खंडहर, टूटे शिखर, दीवारें, घाट आदि हैं जिनके बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी है। इस भूले हुए इतिहास को एक्सप्लोर करने का महत्वपूर्ण काम शुरू किया है नातू फाउंडेशन ने। यंग आर्किटेक्ट्स उन सारे प्राचीन शिल्पों की स्टडी कर रहे हैं।

नातू फाउंडेशन की स्थापना आर्किटेक्ट उदयन नातू ने दो साल पहले अपने पिता की याद में की थी। वे खुद भी आर्किटेक्ट थे। इस फाउंडेशन ने मांडव को वल्र्ड हेरिटेज में शमिल करवाने और बूढ़ी मांडव के वैभव को सबके सामने लाने के लिए डेढ़ साल पहले प्रोजेक्ट शुरू किया है। इस काम में उदयन के साथ उनके आर्किटेक्ट पुत्र ईशान और कई अन्य युवा आर्किटेक्ट और आर्किटेक्चर के स्टूडेंट्स जुड़े हैं। बूढ़ी मांडव जाने के लिए फिलहाल कोई रोड नहीं है, इसलिए 7-8 किलोमीटर टै्रकिंग कर जाना पड़ता है।

वास्तुकला का फ्यूजन
उदयन नातू ने बताया कि बूढ़ी मांडव में जो शिल्प हैं उनका पीरियड 8वीं से 11वीं सदी के बीच का है जब यहां राष्ट्रकूट, परमार और परिहार वंश का राज्य था। यहां के वास्तुशिल्प की खासियत ये है कि ये द्रविडि़यन यानी दक्षिणी भारत और उत्तर भारत की वास्तुकला के संगम का बेहतरीन नमूना है, जिसे विसारा आर्किटेक्ट कहते हैं। मंदिरों की प्लिंथ में राक्षसों की आकृतियां हैं जो द्रविडि़यन आर्किटेक्चर का प्रतीक है और शिखर उत्तर भारत की नागरा शैली के हैं।

तालाब के किनारे घाट के अवशेष
बूढ़ी मांडव में कुछ कुंड हैं और एक तालाब भी है जिसके किनारे घाट के अवशेष हैं। इनमें सीढि़यां साफ नजर आती हैं। ये घाट काफी लंबा है जिससे अंदाज लगाया जा सकता है कि किसी पर्व के समय यहां काफी लोग आते होंगे।

शक्ति साधना का केंद्र
उदयन बताते हैं कि ये मंदिर किसी आक्रमणकारी ने नहीं तोड़े हैं बल्कि इनके नष्ट होने का कारण प्राकृतिक आपदा है। इतिहासकारों का अनुमान है कि ये स्थान यहां के शासकों नेे शक्ति साधना करने के लिए शक्तिपीठ के रूप में विकसित किया था जिसमें बड़े और छोटे मंदिरों का एक बडा़ परिसर था जो करीब 18 स्कवेयर किलोमीटर में फैला हुआ है।

नक्शा तैयार होगा
ईशान नातू ने बताया कि बूढ़ी मांडव में जितने भी अवशेष मिले हैं उनका हम गहरा अध्ययन कर रहे हैं और उस स्टडी के आधार पर हम एक नक्शा तैयार करेंगे। यहां सुरक्षा के लिए बनाई गई दीवार भी मिली है। इस स्टडी का डॉक्यूमेंटेशन भी कर रहे हैं। अगर इस स्थान को पुरातत्व विभाग अपने संरक्षण में लें तो ये एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो सकता है।

सुंदर देव प्रतिमाएं
यहां शिव-पार्वती, विष्णु, नृसिंह अवतार और गणेश की प्रतिमाएं हैं। इनके साथ ही कई प्रतिमाएं कामसूत्र से प्रभावित हैं। प्रणय मुद्राओं में ये प्रतिमाएं खजुराहो की याद दिलाती हैं। शृंगार करती हुई अप्सराओं की मूर्तियां हैं। टूटे मंदिरों के शिखर भी हैं जो खजुराहो के मंदिरों के शिखरों से मिलते-जुलते हैं। मंदिरों के द्वार हैं, प्लिंथ हैं। कहीं दीवारों के अवशेष हैं। ये स्थान पुरातत्व विभाग ने भी संरक्षण में नहीं लिया है, केवल कुछ सुंदर प्रतिमाएं उठा कर मांडू के म्यूजियम में रखी हैं।