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शरीर पर लगी चिप 14 दिन में दे देगी डाइबिटीक मरीज की पूरी जानकारी

एक सतत ग्लूकोज मॉनिटरिंग सिस्टम होता है। इसमें मरीज के शरीर पर चिप लगाई जाती है।

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इंदौर. शहर में डाइबिटीज के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। आमतौर पर लोग तीन तरह की जांच पर फोकस रखते हैं। खाली पेट, भोजन के बाद और तीन माह की एचबीए१सी परंपरागत जाचें हैं, लेकिन अब उन्हें दो अन्य स्तरों पर भी ध्यान देना जरूरी है। इसमें ग्लाइसेमिक वेरिएबिलिटी और क्वालिटी ऑफ लाइफ की तरफ बढऩा होगा। प्रख्यात रिसचर्स ने इन पांचों को मिलाकर एक कॉन्सेप्ट तैयार किया है, जिसे ग्लाइसेमिक पेंटेंड नाम दिया गया है। ये बातें शहर के मधुमेह विशेषज्ञ डॉ. राजेश अग्रवाल ने चर्चा के दौरान कही।

उन्होंने कहा कि ग्लाइसेमिक वेरिएबिलिटी शरीर में ग्लूकोज की मात्रा में हो रहे सतत बदलाव के आधार पर जांची जाती है। एक सतत ग्लूकोज मॉनिटरिंग सिस्टम होता है। इसमें मरीज के शरीर पर चिप लगाई जाती है। ये चिप आगामी १४ दिनों तक मरीजों के खानपान, रूटीन पर निगरानी करेगी। इसके बाद चिप को डॉक्टर के पास मौजूद एक सिस्टम में लगाया जाएगा, जिससे मरीज की पूरा डिटेल मिल जाएगी। इसी आधार पर आगामी जांच तय होगी।

क्या है ग्लाइसेमिक इंडेक्स

डॉ. अग्रवाल ने कहा कि डाइबिटीज के मरीजों के लिए ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जीआई) को समझना बहुत जरूरी है। इससे उन्हें बढ़ते शुगर लेवल पर नजर रखने में मदद मिलेगी। जीआई से खाद्य पदार्थों में कार्बोहाइड्रेट कंटेंट की वैल्यू और ब्ल्ड ग्लूकोज लेवल पर पडऩे वाले उसके प्रभाव का पता चलता है। इस प्रकार डायबिटीज के रोगियों को जीआई फूड्स के बजाय हेल्दी फूड्स चुनने में मदद मिलती है।

ग्लाइसेमिक इंडेक्स रेटिंग सिस्टम
आपको बता दें कि जीआई वैल्यू के अलावा अन्य कई ऐसे कई कारक हैं, जो कार्बोहाइड्रेट के प्रति शरीर में होने वाली प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। दरअसल उम्र, फिजिकल एक्टिविटी लेवल और मेटाबोलिज्म इसमें अहम रोल निभाते हैं कि कार्बोहाइड्रेट कैसे काम करता है। इसके अलावा, जिस तरह से कोई विशेष भोजन तैयार किया जाता है, उससे भी उसकी जीआई वैल्यू बदल सकती है।

स्टार्च का साइज- जिस चीजों में स्टार्च का साइज कम होता है उसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स उतना ही अधिक होता है। इसके अलावा कच्चे खाद्य पदार्थ जिनमें लार्ज पार्टिकल साइज़ होता है उनमें पके हुए फूड्स की तुलना में कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है।

बनाने का तरीका- देर तक पकने वाली चीजों में जीआई वैल्यू अधिक होती है जबकि कम समय में पकने वाली चीजों में कम।

फाइबर की मात्रा- अधिक फाइबर वाली चीजों की कम या मध्यम जीआई वैल्यू होती है और इसलिए इन चीजों को डायबिटीज के मरीजों को खाने की सलाह दी जाती है।

आपको बता दें कि फूड्स की जीआई वैल्यू डायट पर अधिक कंट्रोल करने में सहायक है। ऐसे लोग जो डायबिटीज से पीड़ित नहीं है उन्हें भी हाई और लो ब्लड शुगर लेवल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए हर किसी को अपने खाद्य पदार्थों की पोषण सामग्री की जानकारी होनी चाहिए।

प्रोटीन बढ़ायें
मांसपेशियों के लिए ईंधन का काम करने वाला प्रोटीन आपके पेट में पेपटाइड्स (सिंथेसाइज्ड अमीनो एसिड) का स्तर भी बढ़ाता है। सेसिएटी सिग्नल भेजने के लिए ये पेपटाइड्स मॉलेक्यूलर लेवल पर दिमाग के साथ बातचीत करते हैं। हर बार भोजन करने पर उसमें 20-40 ग्राम प्रोटीन जरूर जोड़ना चाहिए। इसके लिए शाकाहारी भोजन सबसे बेहतर है, क्योंकि इनमें प्रोटीन ज्यादा रहता है और ग्लाइसेमिक इंडेक्स (जीआई) कम रहता है। जीआई जितना कम होगा, आपको पेट उतनी ज्यादा देर तक भरा हुआ महसूस होगा। भारतीय भोजन को ध्यान में रखा जाए, तो सेला चावल और दालें बढ़िया विकल्प हैं।