
पेंटिग्स में नजर आए लोक संस्कृति के रंग
इंदौर. भोपाल की आर्टिस्ट प्रवीण खरे की पेंटिंग्स की चार दिवसीय एग्जीबिशन सोमवार से देवलालीकर कला वीथिका में प्रारंभ हुई। इसका उदघाटन पद्मश्री भालू मोंढे ने किया। प्रवीण मधुबनी शैली में काम करती हैं, लेकिन साथ ही अपनी कल्पनाशीलता का भी प्रयोग करती हैं। उनकी पेंटिंग्स में मधुबनी के चटख रंग और महीन रेखाओं, बारीक फॉम्र्स सहित लोक कलाओं के सभी तत्व मौजूद हैं। वे बुंदेलखंड के ग्रामीण अंचल से ताल्लुक रखती हैं और वहां का ग्राम्य जीवन भी इन रेखाओं में उन्होंने जीवंत किया है।
प्रवीण मधुबनी को उसी तरह बनाती हैं, जिस तरह लोक कलाकार बनाते हैं, यानी ब्रश से नहीं पेन से। पेन की बारीक नोक से वे इतनी बारीक डिटेल देतीे हैं कि उनके कलात्मक धैर्य पर आश्चर्य होता है। उनके ज्यादातर विषय पौराणिक हैं, लेकिन कहीं-कहीं वे उन्हें आधुनिक संदर्भ दे देती हैं। एसी ही एक कलाकृति है गंगा यात्रा, जिसमें गंगा के उद्गम से लेकर समुद्र में मिलने तक की यात्रा है। इसमें गंगा के घाट, मंदिर, नौकाएं, लोगों की भीड़, गंगा में तैरती मछलियां, मगरमच्छ सहित कई डिटेल्स देती हैं। साथ ही कानपुर आदि शहरों के उद्योगों से नदी में हो रहा प्रदूषण भी दिखाती हैं। गंगा की लहरों को उन्होंने पेन के बारीक-बारीक डॉट्स से धैर्यपूर्व रचा है। एेसी ही एक पेंटिंग उन्होंने नर्मदा के लिए भी बनाई है।
एग्जीबिशन में सबसे बड़े आकार की पेंटिंग में श्रीराम और सीता को पुष्प वाटिका में दिखाया है। इसमें पुष्प वाटिका में कुई पेड़-पौधे और उन पर लगे रंग-बिरंगे फूलों की डिजाइन बहुत आकर्षक है। पेड़ों की पत्तियों के अंदर बारीक रेखाएं भी पेन से बनाई गई हैं। सीता के वस्त्रों की डिजाइन में भी बहुत बारीक काम किया गया है। मधुबनी शैली के साथ ब्रश पेंटिंग को मिलाकर उन्होंने बारह ज्योर्तिलिंगों की पेंटिंग्स भी बनाई है, जिनमें रंगों का संयोजन आकर्षक है। विष्णु के सभी अवतार भी उन्होंने मधुबनी शैली में रचे हैं।
मधुबनी में कालिदास : प्रवीण खरे ने मधुबनी पर काफी रिसर्च भी की है और इस शैली की हर बारीकी से वे परिचित हैं। उन्होंने कालिदास के मेघदूतम और अभिज्ञान शाकुंतलम पर भी काम किया है और इन कथाओं को मधुबनी में रच दिया है। ये दो पेंटिंग भी इस नुमाइश का आकर्षण हैं।
बचपन की स्मृतियां
प्रवीण की एक कलाकृति का शीर्षक है गर्मी की छुट्टियों में नानी का आंगन। इसमें अचार के लिए केरियां काटती हुई नानी हैं तो आम, इमली के पेड़ पर चढक़र खेल रहे बच्चे हैं। महिलाएं गेहूं फटक रही हैं। प्रवीण कहती हैं कि यह सब मेरे बचपन की यादें हैं। कुछ पेंटिंग्स उन्होंने अपनी मां को समर्पित की हैं, जिनमें गांव में लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाती, वट सावित्री की पूजा करती और कहीं तुलसी विवाह का मंडप सजाती मां है।
Published on:
02 Apr 2019 04:46 pm

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