15 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

एमबीए की परीक्षा में अब अंग्रेजी में जवाब लिखने का बंधन खत्म

भाषा में छूट देने वाला यूनिवर्सिटी का पहला विभाग बना स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स

2 min read
Google source verification

इंदौर. रेगुलर कोर्सेस की तरह प्रोफेशनल कोर्सेस की परीक्षा में भाषा का बंधन खत्म करने के लिए देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी के एक विभाग ने पहल की है। इस विभाग में पढऩे वाले अब अपनी मर्जी से अंग्रेजी या हिंदी माध्यम में से किसी एक भाषा में परीक्षा दे सकेंगे। एमबीए के साथ ही अन्य सभी कोर्स में दोनों में से एक भाषा चुनने के लिए विभाग ने नोटिफिकेशन जारी कर दिया है।

एआईसीटीई ने परीक्षा की भाषा के लिए यूनिवर्सिटी को अधिकार दे रखे हैं। हाल ही में राज्य सरकार ने भी आरजीवीपी से संबद्ध कोर्सेस की परीक्षा में अंग्रेजी भाषा में जवाब लिखने की अनिवार्यता खत्म कर दी। इसकी वजह उन छात्र-छात्राओं को राहत देना बताया जा रहा है जिनकी अंग्रेजी कमजोर है। देखने में आ रहा था कि सवाल का जवाब पता होने के बावजूद ऐसे छात्र-छात्राएं ठीक से जवाब नहीं लिख पा रहे थे। इस आधार पर देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी से संबद्ध एमबीए कॉलेज के छात्र भी लगातार हिंदी विषय में जवाब लिखने की छूट मांग रहे हैं। यूनिवर्सिटी इस पर कोई फैसला लेती उससे पहले ही स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ने परीक्षा में भाषा का बंधन खत्म कर दिया। विभाग ने नोटिफिकेशन जारी किया है कि विभाग में पढऩे वाले सभी छात्र-छात्राएं अपनी मर्जी से हिंदी या अंग्रेजी किसी भी भाषा में परीक्षा दे सकते हैं। विभागाध्यक्ष प्रो. पीएन मिश्रा का कहना है कि ऑर्डिनेंस ३१ के तहत हिंदी या अंग्रेजी भाषा का विकल्प चुनने का निर्णय लिया गया है। विभाग में संचालित सभी कोर्सेस के छात्र अब हिंदी में भी जवाब लिख सकेंगे।

कॉलेजों में छूट दी तो कौन जांचेगा कॉपी
एक विभाग में मिली इस छूट के बाद कॉलेज में पढऩे वाले छात्रों को उम्मीद है कि उन्हें भी जल्द राहत मिल सकती है, लेकिन इस मामले में यूनिवर्सिटी ने अब तक कोई रुख स्पष्ट नहीं किया है। विभाग में गिनती के छात्र-छात्राओं में से दोनों माध्यम की कॉपी अलग-अलग छांटकर जंचवाई जा सकती है जबकि कॉलेजों में पढऩे वाले हजारों छात्र-छात्राओं की कॉपियां अलग करना ही बड़ी चुनौती होगा। हिंदी में मैनेजमेंट विषय की कॉपी जांचने वाले मूल्यांकनकर्ता भी यूनिवर्सिटी के पास नहीं है। इससे मूल्यांकन भी प्रभावित हो सकता है।