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ब्रह्मपुत्र नदी में फंस गई थी गाडि़यों से लदी बोट, हिम्मत से जीत ली जिंदगी की जंग

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dr arvind prabhu

dr arvind prabhu

कन्हैया यादव@ इंदौर. हर सफल व्यक्ति की दर्दनाक कहानी होती है और दर्दनाक कहानी का सफल अंत होता है। इन्हीं लाइनों के इर्दगिर्द घूमती है मुंबई के डॉ. अरविंद प्रभु की कहानी। डॉ. अरविंद मिसाल है उन लोगों के लिए जो खुद को कमजोर समझकर हार मान लेते हैं। वे बेहद घुमक्कड़ और खुशनुमा व्यक्तित्व के मालिक हैं, लेकिन एक सडक़ दुर्घटना में हाथ और पैर खो चुके हैं। पिछले ३० साल वे व्हील चेयर पर है। इसके बावजूद भी उन्होंने कई यात्रा की है। आईए जानते हैं डॉ. प्रभु के जीवन के संघर्षों और रोचक यात्राओं की कहानी उन्हीं की जुबानी।

घुमक्कड़ मिजाज के कारण मुझमें जोश और जुनून का संचय बना रहता है। ३० साल पहले बेंगलूरु से आते वक्त मेरा एक्सीडेंट हो गया, जिसमें स्पाइनल कॉर्ड खराब हो गई। इसी वजह से आज भी चेस्ट के नीचे का पूरा हिस्सा पैरालाइज्ड है। कुछ महीनों बाद ही खुद के इरादों को मजबूत किया। मन में कहीं घूमने जाने का विचार आया और निकल पड़ा यात्रा पर। व्हील चेयर पर होने के बावजूद १९ हजार किमी की यात्रा मात्र ८४ दिनों में पूरी की। इस दौरान २८ राज्यों में घूमा हूं। इस यात्रा के दौरान कई बार जिंदगी को दांव पर भी लगाया है। एेसा ही एक वाक्या मेरे और मेरी टीम के साथ बना था। हमें ब्रह्मपुत्र नदी को पार मजुली आइलैंड पर जाना था। इसके लिए हमें ७०० किमी का सफर तय करना था। हमें अरुणाचल प्रदेश से वापस तेजपुर आकर फिर उल्टा मणिपुर जाना पड़ता। तब सोचा कि अरुणाचल प्रदेश से लखीमपुर क्रॉस करेंगे और मजुली आइलैंड पहुंचेंगे। इससे 700 किमी नहीं घूमना पड़ेगा।

इसके लिए ब्रह्मपुत्र नदी को क्रॉस करना था। हमने गांव के नाविकों की मदद से छोटी नाव हायर की। उस पर गाडि़यां लोड की। कई बार सोचा कि फैसला वापस ले लें, लेकिन एक विश्वास था कि डूबेगी नहीं। आखिरकार जोखिम लिया और ३-४ गाडि़यां बोट पर लोड करवा दी। जब नदी के बीचों बीच पहुंचे तो बोट हिलने लगी। उस समय लगा कि मौत निश्चित है, क्योंकि गाडि़यां एक इंच भी इधर-उधर होती है तो नदी में समा जाते। हमने हिम्मत नहीं हारी और किसी तरह नदी पार कर ली। उस समय एेसा लगा कि दुनिया जीत ली हो।