
इंदौर. मध्यप्रदेश क्रिकेट के सबसे सफल प्रशासक डॉ. एमके (महेंद्र कुमार) भार्गव का मंगलवार को निधन हो गया। कुछ दिनों से लिवर की बीमारी से परेशान भार्गव ने सुबह अंतिम सांस ली। शाम को बड़ी संख्या में क्रिकेटर्स, एमपीसीए सदस्यों, पदाधिकारियों और डॉक्टरों की मौजूदगी में तिलक नगर मुक्तिधाम में अंतिम संस्कार किया गया। 5 फरवरी 1939 को जन्मे भार्गव 1981 से एमपीसीए के माध्यम से क्रिकेट की सेवा कर रहे थे। 80 के दशक से क्रिकेट को मप्र में गढऩे और अंतरराष्ट्रीय ऊंचाइयों तक ले जाने में उनका अहम योगदान रहा है। इसके चलते पिछले साल एमपीसीए ने उन्हें लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से नवाजा था। उनकी क्रिकेट के प्रति दीवानगी ऐसी थी कि 79 साल की उम्र में भी युवा की तरह जुटे रहते थे। खास बात यह है, नेहरू स्टेडियम से शुरू हुए इंदौर के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सफर में हुए सभी बड़े मैचों की आयोजन समिति का प्रमुख उन्हें बनाया गया। एमपीसीए पर आई विपत्तियों का उन्होंने आगे आकर सामना किया। 1981 में उन्होंने सहसचिव के रूप में पहली बार एमपीसीए में प्रवेश किया था। तब बेहद कम संसाधन थे। एमपीसीए ने 1983 में भारत- वेस्टइंडीज के बीच अंतरराष्ट्रीय मैच इंदौर में कराया था।
सूटकेस में एमपीसीए
1985 में एमपीसीए का सचिव बनाए जाने के बाद भार्गव ने क्रिकेट के भले के लिए हर जरूरी कदम उठाए। उनके साथी बताते हैं, तब सिर्फ एक सूटकेस में डॉ. भार्गव पूरा एमपीसीए चलाते थे। न तो पैसा था न लोग। एक सूटकेस में सारे दस्तावेज रख अंतरराष्ट्रीय मैच करा दिए। १३ साल सचिव रहते हुए भार्गव ने इंदौर में सात अंतरराष्ट्रीय मैच कराए थे।
टीम इंडिया को संभाला
भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड ने टीम के कई दौरों में डॉ. भार्गव को मैनेजर बनाकर विदेश भेजा। सचिव कार्यकाल के बाद एमपीसीए ने उन्हें चेयरमैन, फिर उपाध्यक्ष बनाया। भार्गव कान, नाक और गले के डॉक्टर भी थे।
क्रिकेट को देने आए थे
हमने मप्र के महान क्रिकेट प्रशासक को खो दिया है। उन्होंने पूरा जीवन इस खेल को समर्पित किया है। आज एमपीसीए जिस मजबूती से देश-दुनिया में नाम कमा रहा है उसमें डॉ. भार्गव का अहम रोल है। उन्होंने क्रिकेट से कुछ चाहा नहीं, सिर्फ दिया है। मैं जब क्रिकेट खेलता था तब से उनसे जुड़ा था। उन्होंने मुझे काफी सिखाया है।
संजय जगदाले,
क्रिकेट डायरेक्टर, एपीसीए
स्पष्टवादिता के मुरीद
डॉ. भार्गव के व्यक्तित्व की खासियत स्पष्टतावादी थी। इसके कारण एमपीसीए क्या बीसीसीआई के पदाधिकारी भी प्रभावित थे। मुझे वे छोटा भाई मानते थे और क्रिकेट कमेंट्री के दौरान गलतियों पर टोकते भी थे। मेरी सफलता में उनका भी अहम योगदान है। उन्होंने इस खेल को सिर्फ दिया है। आखिरी दम तक वे क्रिकेट की सेवा करते रहे।
सुशील दोषी, पद्मश्री और कमेंटेटर
Published on:
07 Mar 2018 09:14 am
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