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सेठ हुकमचंद के घर से लाए सोने की थाली नीलाम कर रा​शि दी हिंदी साहित्य समिति को

- इंदौर में ही मधुशाला पर गांधीजी ने हरिवंशराय बच्चन से मांगा स्पष्टीकरण- आजादी के आंदोलन में हिंदी प्रसार व राष्ट्रभाषा बनाने के आंदोलन का बड़ा केंद्र रहा

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इंदौर

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Sandeep Pare

Aug 05, 2022

सेठ हुकमचंद के घर से लाए सोने की थाली नीलाम कर रा​शि दी हिंदी साहित्य समिति को

सेठ हुकमचंद के घर से लाए सोने की थाली नीलाम कर रा​शि दी हिंदी साहित्य समिति को

इंदौर. gandhi golden plate आजादी के आंदोलन में इंदौर की अहम भूमिका रही है। यह क्रांतिकारियों के ठिकानों के साथ शब्दों से लोगों में जोश भरने वाले जाने-माने साहित्यकारों का भी केंद्र रहा। हिंदी साहित्य समिति इसका जीता-जागता उदाहरण है। महात्मा गांधी यहां दो बार आए। पहली बार 1918 में आए तो भवन का शिलान्यास किया और दूसरी बार 1935 में आए तो उद्घाटन किया। यहीं से देश में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का आगाज भी किया। गांधीजी ने दक्षिण राज्यों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए साहित्यकारों की टोलियों के साथ अपने बेटे को भी भेजा था। गांधीजी मालवा के लोगों की हिंदी से प्रभावित होकर बोले थे, यहां हिंदी भवन होना चाहिए। उसी की देन है यह समिति।

दरअसल, गांधीजी सर सेठ हुकमचंद जी के यहां भोजन के लिए गए। भोजन के बाद उन्होंने सेठजी से कहा, आपको पता होगा मैं तो भोजन की थाली साथ ले जाता हूं। यह सोने की थाली है। सेठ ने कहा, आप इसे ले जाइए। गांधीजी थाली अपने साथ समिति ले आए। इसे नीलाम कर राशि जमा करवा गए। देश की सबसे प्राचीनतम समिति की स्थापना 1915 में की गई थी। भवन का शिलान्यास 30 मार्च 1918 को गांधी ने किया था। इसी दौरान हिंदी सम्मेलन और मद्रास में हिंदी प्रचार-प्रसार की रूपरेखा बनी, टोलिया तय की गई थीं। पुरुषोत्तम दास, मदनमोहन मालवीय, बनारसीदास चतुर्वेदी, श्रीनारायण चतुर्वेदी इस काम में लगे रहे। इसके बाद वर्धा, प्रयाग में केंद्र बने।

(जैसा समिति के प्रधानमंत्री सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी ने बताया )
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बच्चन ने बापू को मधुशाला पर दिया स्पष्टीकरण
उन दिनों कवि हरिवंशराय बच्चन सम्मेलन में आए हुए थे। गांधी नवीन भवन का उद्घाटन करने आए थे। साहित्यकार बच्चन की मधुशाला से नाराज थे। इसे नशे को बढ़ावा देने वाला साहित्य बताने लगे। कुछ साहित्यकारों ने गांधी से कहा, आपको बच्चन से बात कर इसे रोकना चाहिए। गांधी ने जाने से पहले बच्चन से बात की तो उन्होंने बताया, मधुशाला से लोगों में गलतफहमी है। मधुशाला जाना तो दूर, मैं तो छूता तक नहीं हूं। मेरी मधुशाला लोगों में आजादी के लिए जोश-जुनून का प्रतीक है। गांधी ने आश्वस्त होकर साहित्यकारों से कहा, वह गलत नहीं है, आप मधुशाला पढ़ें।