13 अगस्त 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

Gen-Z से ज्यादा स्क्रीन एडिक्ट Gen Alpha, 10 में से 5 बच्चों को लगा चश्मा, टेंशन में एमपी में एक्सपर्ट्स

Gen Alpha Screen Addiction : शहर में कम उम्र में चश्मे का नंबर आने वाले बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिसे लेकर शहर के विशेषज्ञों ने चिंता जताई है।
3 min read
Google source verification
Gen Alpha Screen Addiction

Gen Alpha Screen Addiction (Gen-Z से ज्यादा स्क्रीन एडिक्ट Gen Alpha Photo Source- Patrika)

Indore News : जिस उम्र में बच्चों की आंखें मैदान, पेड़-पौधों और खुले आसमान को देखने की आदी होनी चाहिए, उसी उम्र में जेन अल्फा की नजर मोबाइल, टीवी और टैबलेट की स्क्रीन पर ज्यादा टिक रही है। इसका असर अब आंखों की सेहत पर दिखाई देने लगा है। खासतौर पर मध्य प्रदेश के सबसे प्रमुख शहर इंदौर में कम उम्र में चश्मे का नंबर आने वाले बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, जिसे लेकर शहर के विशेषज्ञों ने चिंता जताई है।

एमजीएम मेडिकल कॉलेज के स्कूल ऑफ एक्सीलेंस फॉर आई और एमवाय अस्पताल के नेत्र रोग विभाग में जांच के लिए पहुंचने वाले हर दस में से चार से पांच बच्चों में चश्मे का नंबर सामने आ रहा है। नेत्र विशेषज्ञों के अनुसार, जेन अल्फा में मायोपिया यानी दूर की वस्तुएं धुंधली दिखाई देने की समस्या तेजी से बढ़ रही है। इसके साथ आंखों में जलन, सूखापन, पानी आना, किरकिराहट और सिरदर्द जैसी शिकायतें भी बच्चों में आम हो रही हैं। विशेषज्ञ इसके पीछे बढ़ रहे स्क्रीन टाइम और घटती आउटडोर गतिविधियों को प्रमुख कारणों में मान रहे हैं।

स्क्रीन देखते-देखते आंखों में सूखापन

लंबे समय तक मोबाइल या टीवी देखने के दौरान पलक झपकाने की दर कम हो जाती है। इससे आंखों की सतह पर मौजूद आंसुओं की परत प्रभावित होती है। परिणाम स्वरूप बच्चों में ड्राई आई, जलन, किरकिराहट और आंखों से पानी आने जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं। विशेषज्ञ इसे डिजिटल आई स्ट्रेन से जोड़ते हैं।

बचपन से स्क्रीन के बीच बड़ी हो रही नई पीढ़ी

करीब 2013 के बाद जन्मे बच्चों को जेन-अल्फा कहा जाता है। यह पहली ऐसी पीढ़ी है, जिसने बचपन से स्मार्टफोन, टैबलेट, स्मार्ट टीवी और इंटरनेट को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा देखा है। पढ़ाई से लेकर मनोरंजन तक स्क्रीन पर निर्भरता बढ़ी है। समस्या केवल स्क्रीन टाइम की अवधि नहीं है। मोबाइल को लगातार नजदीक से देखने के दौरान आंखों को लंबे समय तक पास की वस्तु पर फोकस करना पड़ता है। दूसरी ओर, बच्चों के खेलने और प्राकृतिक रोशनी में समय बिताने की अवधि घट गई है। यही संयोजन मायोपिया के जोखिम को बढ़ा रहा है।

इन संकेतों को नजरअंदाज न करें

-बच्चा टीवी के बहुत करीब बैठने लगे।
-मोबाइल या टैबलेट आंखों के बेहद पास रखकर देखने लगे।
-स्कूल में दूर से लिखी चीजें पढ़ने में परेशानी हो।
-स्क्रीन देखने के बाद आंखें मले।
-लगातार सिरदर्द की शिकायत करे।
-आंखों में जलन, सूखापन आने लगे।
-दूर की वस्तु देखते समय आंखें सिकोड़ने लगे।

अब बोर्ड नहीं, मोबाइल बन रहा जांच की वजह

कुछ साल पहले बच्चों की आंखों की जांच कराने का प्रमुख कारण स्कूल में बोर्ड साफ दिखाई नहीं देना या किताब पढऩे में परेशानी होना था। अब तस्वीर बदल रही है। अभिभावक बच्चे के टीवी के बहुत करीब बैठने, मोबाइल को आंखों के पास लाने, बार-बार आंखें मलने या स्क्रीन देखने के बाद सिरदर्द की शिकायत के बाद नेत्र चिकित्सक के पास पहुंच रहे हैं। मायोपिया होने पर दूर की चीजें स्पष्ट दिखाई नहीं देतीं। बच्चा दूर की वस्तुओं को देखने के लिए आंखें सिकोड़ सकता है, टीवी के पास जाकर बैठ सकता है या स्कूल में दूर से लिखी चीजों को पढऩे में परेशानी महसूस कर सकता है।

जेन अल्फा में क्यों बढ़ा स्क्रीन एक्सपोजर?

इस पीढ़ी के लिए स्क्रीन केवल मनोरंजन का साधन नहीं है। स्कूल का होमवर्क, ऑनलाइन क्लास, वीडियो, गेम, जानकारी जुटाना और दोस्तों से संपर्क जैसी कई गतिविधियां डिजिटल माध्यम पर आ गई हैं। ऐसे में स्क्रीन से पूरी तरह दूरी बनाना व्यावहारिक नहीं है। जरूरत स्क्रीन के संतुलित इस्तेमाल और उसके बीच पर्याह्रश्वत ब्रेक की है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के रोजमर्रा के समय में आउटडोर एक्टिविटी, खेल और प्राकृतिक रोशनी को पर्याह्रश्वत जगह देना जरूरी है। स्क्रीन की आदत जितनी कम उम्र में नियंत्रित होगी, उतना ही आंखों पर पडऩे वाला अनावश्यक दबाव कम किया जा सकेगा।

सलाह: 20-20-20 नियम से दें आंखों को ब्रेक

नेत्र विशेषज्ञ स्क्रीन इस्तेमाल के दौरान 20-20-20 नियम अपनाने की सलाह देते हैं। इसके तहत हर 20 मिनट में करीब 20 सेकंड के लिए स्क्रीन से नजर हटाकर लगभग 20 फीट दूर की वस्तु देखनी चाहिए। इससे लगातार पास देखने के कारण आंखों पर पडऩे वाला तनाव कम करने में मदद मिल सकती है। स्क्रीन के बीच नियमित ब्रेक भी जरूरी हैं।

एक्सपर्ट व्यू : चश्मा लगने का इंतजार कभी न करें

स्कूल ऑफ एक्सीलेंस फॉर आई की नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. मिता जोशी का कहना है कि,जांच के लिए आने वाले हर दस में से चार से पांच बच्चों में चश्मे का नंबर सामने आ रहा है। सिरदर्द, आंखों में जलन और पानी आने जैसी शिकायतें भी बढ़ी हैं। बच्चों के गैजेट इस्तेमाल को संतुलित करने के साथ उन्हें साइकिल चलाने, बाहर खेलने और अन्य आउटडोर गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

वहीं, नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. रोहित अग्रवाल ने बताया कि, जेन जी के साथ अब जेन अल्फा में भी तेजी से चश्मे का नंबर आ रहा है। यदि बच्चा स्क्रीन को बहुत पास से देखता है, दूर की चीजों को देखने के लिए आंखें सिकोड़ता है या बार-बार सिरदर्द और आंखों की परेशानी बताता है तो चश्मा लगने का इंतजार नहीं करना चाहिए। समय पर जांच से समस्या की पहचान कर उसके बढ़ने की गति को नियंत्रित किया जा सकता है।