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होली का झंडा नहीं तोडऩे तक पुरुषों की होती है पिटाई

होली की रात पुरुषों को कर देते हैं घर से बाहर

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इंदौर

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Ramesh Vaidh

Mar 09, 2020

होली का झंडा नहीं तोडऩे तक पुरुषों की होती है पिटाई

पुरुषों की होती है पिटाई

खंडवा. जिला मुख्यालय से करीब 50 किमी दूर ग्राम कावडिय़ाखेड़ा के गोसाई समाज में एक अनूठी परंपरा है। गोसाई समाज में महिलाएं होली वाली रात पुरुषों को घर से बाहर निकाल देती हैं। पुरुष तब तक नहीं आ सकते, जब तक होली पर महिलाओं द्वारा लगाया गया झंडा ना तोड़ दें। गोसाई समाज के लोग बताते हैं कि होली के एक दिन पहले परिवार के सभी पुरुष रातभर घर के बाहर ही रहते हैं। होली जलने के बाद वापस घर लौटने पर झंडा तोडऩा पड़ता हैं। मैदान में एक लाइन खींच दी जाती हैं, जिसे पार कर पुरुषों को झंडा तोडऩा होता हैं। जब तक ये झंडा कोई पुरूष नहीं तोड़ता, तब तक महिलाएं घर में आने नहीं देतीं। झंडा तोडऩे की रस्म के दौरान महिलाएं अपने हाथों में डंडा लेकर पुरुषों को मारती हैं। इधर, कोरकू जनजाति हर साल दो दिन होली जलाती है। रंग-गुलाल पांच दिनों तक खेला जाता है। पुरुष फगुनई गाते हैं। होली का डांडा जिस दिशा में गिरता है, उससे शुभ-अशुभ का आंकलन किया जाता है।
पेड़ नहीं काटते,परंपरा का करते हैं निर्वहन
जिले के वन क्षेत्र के ग्राम कमलिया और कवेश्वर में आदिवासी होली दहन के लिए पेड़ नहीं काटते, बल्कि जंगल के वृक्षों से टूटी हुई टहनियों को उठाकर होलीमाल के नाम से चयनित स्थान पर रखते हैं। होलीमाल का यह स्थान आदिवासियों के लिए पूज्य होता है। बताया जाता है कि जंगल से गुजरने वाला हर व्यक्ति जंगल में पड़ी बेकार पेड़ों की टहनियां उठाकर होलीमाल को अर्पित करता है। यह सिलसिला वर्ष भर चलता है। इस तरह एक-एक करके होलीमाल के रूप में लकडिय़ों का ढेर लग जाता है।

इधर, सतना में फाल्गुन एक महीना नहीं बल्कि रिश्तों का जमघट है और होली का रंग उन रिश्तों को गाढ़ा करता है। इसीलिए इसे आम बोलचाल की भाषा में होरी का भी संबोधन किया जाता है। अवध संस्कृति की छाप छोडऩे वाली बघेली होली के रंग बघेलखंड में सात दिन तक बिखरे रहते हैं। धुलेड़ी से शुरू होने वाले रंगोत्सव का सिलसिला रंगपंचमी के बाद भी जारी रहता है। पुरुष ढोलक-नगडिय़ा, झांझ-मजीरे के साथ मस्ती में ऊंचे स्वरों में समूचे गांव में घर-घर जाकर फाग जोहारते हैं तो महिलाएं घरों के आंगन में फगुआ गाकर उत्सव में चार चांद लगाती हैं। रीवा, सतना, सिंगरौली के साथ ही सीधी के आदिवासी बहुल इलाके में इसका विशेष महत्व है। आदिवासियों के बीच होली का पर्व खास मायने रखता है। ये दिनभर लोकनृत्य करते हैं।
परिवार का बहिष्कार तक हो जाता है
होली की ठिठोली के बीच एक भाव ऐसा भी है, जो गाली बन जाता है। इससे कहते हैं कबीर बोलना। गांव में अगर अलसुबह कोई कबीर बोल दे तो उस परिवार को बहिष्कृत करने तक की नौबत आ जाती है। होता यह है कि जिन परिवारों में विवाहेत्तर संबंधों की चर्चा चलती रहती है, शरारत करने वाले होली के दिन घर के पिछवाड़े जाकर कबीर बोलते हैं। यह थोड़ा अश्लीलता का पुट लिए भी होता है, इसलिए भी वर्जित है।