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एक था कमाल कवि, नाम था बालकवि

बालकवि बैरागी की याद में हिंदी साहित्य समिति में कवि सम्मेलन

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एक था कमाल कवि, नाम था बालकवि

इंदौर. दोपहर तक रिमझिम से ठंडी हुई शाम ढलने के बाद मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति के आंगन में कविता की फुहारें बरसीं। यहां संस्कृति विभाग और हिंदी साहित्य समिति के संयुक्त आयोजन में बालकवि बैरागी की याद में कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ। इसमें मशहूर कवि दिल्ली के सुरेंद्र शर्मा, हरदा के माणिक वर्मा, शहर के सरोज कुमार, चंद्रसेन विराट, प्रदीप नवीन, उज्जैन के मोहन सोनी, तराना के मालवी कवि सुल्तान मामा और प्रतापगढ़ की कवयित्री भुवना मोहिनी ने कविताएं पढ़ीं। संचालन जाने-माने कवि सत्यनारायण सत्तन ने किया।

तराना से आए ९३ बरस के वयोवृद्ध मालवी कवि सुल्ताना मामा बेहद सुंदर मालवी कविताएं पढ़ीं, जिनमें फागण में बिरहण शीर्षक वाली कविता श्रोताओं को आनंदित कर गई। ‘फरर फरर फागन फरकीरियो केसूड़ी इतरइरी हे/अंबुवा की डाली पे बेठी कोयल गीत सुनइरी हे/जदे बसंती हवा चले तो मन में पीर जगावेरे, म्हारी काजल वाली आखां में से टप टप मोती जावे रे/इन मोती को मोल निरखने पंख लगइने आजेरे।’

सत्तन की एक रचना के अंश कुछ यूं थे, ‘जिंदगी की किताब गीता थी अब वो खैयाम की मधुशाला है/ हर उजाले की राह मे तम है, हर अंधेरे का घर उजाला है/जिंदगी वक्त की किताब नहीं सिर्फ कुछ हाशियों का मेला है, जिसके दिल में है अनलिखे अक्षर पढऩे वाला वहां अकेला है।’चंद्रसेन विराट ने आंसू और करुणा पर कविता पढ़ी, ‘यदि आंसू को तुम पानी कहते हो गंगाजल अपमानित होता है/ पीड़ा ब्रह्मा की आदि भावना है, आंसू ही उसका पहला बेटा है।’

सरोज कुमार ने बालकवि बैरागी पर लिखी अपनी लंबी कविता सुनाई- ‘एक था कमाल कवि नाम था बालकवि/मूल नाम नंदराम, था मनासा मुकाम/गरीबी में पला था कोयल सा गाता था/गली गली गाता था भीख मांग खाता था/गा गाकर बड़ा हुआ, पांव पर खड़ा हुआ/पढऩे जाने लगा, मंचों पर गाने लगा/ वो चुनाव भी लड़ा नेता बन गया बड़ा/नेहले पर देहला था लेकिन कवि पहले था/सदन में विधायक था/बाहर कवि गायक था/स्वाभिमान का प्रतीक, पारदर्शिता सटीक/ शून्य से उठा और शिखर चूमता रहा/ काजल के गलियारे बेदाग घूमता रहा।’

प्रदीप नवीन ने शब्दों से मनुहार करते हुए कहा- ‘मैं गीतों से प्यार करूं, एक नहीं सौ बार करूं /सारे श्रोता झूम उठें शब्दों से मनुहार करूं।’ माणिक वर्मा ने बेरोजगारी और इमान की कमी वाले इस दौर पर व्यंग्यात्मक रचना सुनाई। सुरेंद्र शर्मा ने चिरपरिचित घराड़ी शृंखला में कविता सुनाई- ‘हमने पत्नी से कहा तुलसीदास ने लिखा है, ढोल गंवार शूद्र पशु और नारी, ये सब ताडऩ के अधिकारी/इसका अर्थ समझती हो या समझाएं/घराड़ी बोली इसके अर्थ तो बिलकुल साफ हैं, एक जगह मैं हूं बाकी जगह आप हैं।’ प्रतापगढ़ की भुवन मोहिनी ने शृंगारिक भाव की कविता पढ़ी- ‘तुम जो छू लो शिवाला बन जाऊं प्रेम का, एक मीरा दीवानी तो मुझ में भी है।’