इंदौर। क्रिकेट का लंबा गोल हरा मैदान और मैदान का सेंटर होता है क्रिकेट पिच। मैदान के बीच में पहले 100 बाय 10 फीट की जगह का चुनाव किया जाता है और उसके बाद इस चुनी हुई जगह पर (स्टम्प से स्टम्प) 66 बॉय 10 फीट की जगह का चुनाव क्रिकेट की पिच के लिए किया जाता है। यह जगह मैदान के सेंटर में होती है। इस पर लगी घास की बार-बार कटाई की जाती है।
पिच दो तरह की होती हैं, प्राकृतिक पिच और कृत्रिम पिच। दुनिया के कुछ हिस्सों में शौकिया क्रिकेट के लिए कृत्रिम पिच का इस्तेमाल किया जाता है। कृत्रिम पिच को कांक्रीट की स्लैब पर जूट की चटाई औऱ नकली घास को बिछाकर तैयार किया जाता है। हलाकिं तकनीकी रुप से कृत्रिम पिच को पूरी तरह गलत माना जाता है और इसका इस्तेमाल अंतराष्ट्रीय क्रिकेट मैच में बिलकुल नहीं किया जाता है। क्या है पिच से जुड़े अंतराष्ट्रीय नियम, कैसे बनाई जाती है क्रिकेट पिच। इन सभी सवालों का जवाब पढ़िए इस रिपोर्ट में...
ये हैं क्रिकेट पिच के नियम
1- सेंटर में पिच: क्रिकेट की पिच के लिए अंतराष्ट्रीय क्रिकेट में बेहद सख्त नियम हैं। तकनीकी रुप में इसे मानक के आधार पर ही तैयार किया जाता है। क्रिकेट की अधिकांश पिच व्यवहारिक रुप से नार्थ-साउथ दिशा की और बनाई जाती है, क्योंकि साउथ से आने वाली सूर्य की तीखी किरणें बैट्समेन के लिए परेशानी का सबब बन सकती हैं।
2- प्रोटेक्टेड एरिया: पिच में दो स्टंप्स के बीच की जगह को प्रोटेक्टेड एरिया कहा जाता है इसे पूरी तरह से सपाट औऱ समतल बनाया जाता है। पिच को अच्छी तरह से नियमपूर्वक तैयार करना खेल में निष्पक्षता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है। इसे प्रोटेक्टेड एरिया इसलिए कहा जाता है क्योंकि पिच से सामान्यतः फील्डर दूर ही रहते हैं. जिससे पिच खराब न हो।
पिच यदि नियमानकूल ना हो तो वह गेंदबाज को अप्रत्याशित लाभ दे सकता है। गेंद अप्रत्याशित रूप से बाउंस, टर्न और स्विंग ले सकती है। इसलिए मैच के दौरान भी विकेट कीपर से लेकर अंपायर सभी की जगह तय रहती है। फील्डर को भी पिच से बाहर मैदान में तैनात किया जाता है।
3- इफेक्ट ऑफ वेदर: अक्सर कॉमेट्री में सुना होगा 'पिच' आज पहले बल्लेबाजों को सपोर्ट करेगी। जैसे-जैसे दिन चढ़ता जाएगा घास की नमी कम होगी यह 'बॉलर' को सपोर्ट करने लगेगी। जी हां, अतंराष्ट्रीय क्रिकेट में पिच को 'नेचुरल तरीके' से बनाया जाता है। इसलिए पिच पर मौसम का असर बहुत ज्यादा होता है। यदि पिच गीली हो गई है तो वह 'फॉस्ट बॉलर' को सपोर्ट करेगी। यदि पिच में दरार आ गई है वह जरूरत से ज्यादा सूखी है तो 'स्पिनर' को मदद मिलेगी। पहले इस तरह दरार वाली सूखी पिच को 'धूल का कटोरा' या 'बारूदी सुंरग' जैसे नामों से बुलाया जाता था।
आजकल पिच क्यूरेटर पिच की जिस तरह से देखभाल करते हैं उससे यह मौके कम ही आते हैं। साथ ही पूरे मैदान को ही मैच से पहले कवर करके रखा जाता है जिससे सुबह की ओस या बारिश के कारण पिच में नमी ना आए। इसके अलावा यदि अचानक बारिश हो गई हो तो 'हॉग मशीन' की मदद से पिच और मैदान को सुखाया जाता है।
4- पिच मूविंग: पिच की घास मैदान की तुलना में बेहद छोटी रखी जाती है। मैच के दौरान प्रत्येक दिन सुबह पिच की घास की मूविंग जरूर की जाती है।
5- पिच स्वीपिंग: पिच के उपर से व्यर्थ धूल को हटाने के लिए पिच स्वीपिंग की जाती है, लेकिन इस दौरान इसका खास तौर पर ध्यान रखा जाता है कि स्वीपिंग से पिच को नुकासान न हो। पिच स्वीपिंग प्रत्येक दिन की शुरुआत में की जाती है. यदि कप्तान खेल के मध्य में पिच स्वीपिंग करवाना चाहे तो उसे अंपायर से खास अनुमति लेनी होती है। इस तरह की पिच स्वीपिंग लंच टाइम में होती है।
6- पिच रोलिंग: मैच के दौरान बल्लेबाजी कर रहे पक्ष का कप्तान प्रत्येक पारी के शुरु होने से पहले 7 मिनिट के लिए पिच को रोल करने का अनुरोध कर सकता है। पिच पर रोलर घुमाने से पिच औऱ अधिक सपाट हो जाती है। वनडे क्रिकेट के साथ-साथ टैस्ट क्रिकेट में पिच रोलिंग का खास महत्व है। बैटिंग कर रही टीम का कप्तान टेस्ट मैच में पिच यदि अनुकूल ना लग रही हो तो लंच ब्रेक में भी पिच रोलिंग करने का अनुरोध कर सकता है।
7- फुटहोल्स भरना: यदि मैच सीरीज लंबी हो या टैस्ट मैच चल रहे हों तो अकसर पिच पर गेंदबाजों और बल्लेबाजों के जूतों से छोटे-छोटे होल्स बन जाते हैं। अंपायर इन होल्स पर नजर रखता है। यदि होल्स ज्यादा हो गए हों तो उन्हें तुरंत भरवाया जाता है।
8- मैदान पर अभ्यास: मैच से पहले अभ्यास के लिए अलग पिच बनाई जाती है। मैच के दौरान मुख्य पिच किसी तरह से खराब ना हो इस बात का खास ख्याल रखा जाता है। अभ्यास के लिए मैदान के किनारे पर एक अलग पिच तैयार की जाती है, जिसपर खिलाड़ी प्रैक्टिस मैच के दौरान अभ्यास करके जगह विशेष की पिच और मौसम के बारे में जानकारी हासिल करते हैं।
अब जानिए कैसे बनती है पिच:
1- खुदाई: जगह का चुनाव होने के बाद मैदान में 12 से 13 इंच की खुदाई की जाती है।
2- स्लोप: खुदाई के बाद ईट का चूरा डालकर स्लोप बनाया जाता है। फिर ड्रेनेज लाइन डाली जाती है। जिससे एकाएक बारिश के समय पिच पर पानी ना भरे।
3- रेत और मिट्टी और ईट की टुकड़े: पिच पर ड्रेनेज लाइन डालने के बाद फिर चार इंच ईट का चूरा डाला जाता है, इसमें फिर रेत डाली जाती है। रेत के मुकाबले 10 प्रतिशत मिट्टी डाली जाती है। 90 प्रतिशत रेत और ईट के चूरे के हिसाब से पिच में 10 प्रतिशत मिट्टी का उपयोग होता है ।
4- लेबल की जांच: चूंकि बैट्समैन रनिंग बिटवीन स्टंप लेता है और बॉलर पिच पर ही गेंदबाजी करता है, इसलिए रेत और मिट्टी डालने की प्रकिया में बार-बार लेवल चैक करते हैं। इसे समतल होना बेहद जरूरी है। इसके लिए पिच बनाते समय रोलर चलाया जाता है।
5- प्लेटिंग करना: रेत और मिट्टी डालने के बाद प्लेट को वायब्रेट करके कॉम्पेक्ट करते हैं। जिससे प्लेटिंग पूरी तरह से समतल हो सके। पिच बनाने की प्रोसेस के दौरान कई बार रोलर का उपयोग किया जाता है जिससे पिच लगातार समतल रहे।
6- पिच और घास: रेत औऱ मिट्टी, ईट का चूरा डालने के बाद फिर से पिच पर काली मिट्टी डालकर लेयर बनाई जाती है। जब दो इंच की जगह बचती है तो उसपर घास उगाई जाती है। घास की लगातार कटाई की जाती है। रोज पिच पर पानी डाला जाता है और रोलर चलाया जाता है।
होलकर का मैदान खास-
चीफ पिच क्यूरेटर समंदर सिंह चौहान के मुताबिक देश के अधिकांश स्टेडियमों के मैदान बनाने में रेत (सेंड बेस) का उपयोग किया गया है, जबकि होलकर स्टेडियम काली और लाल मिट्टी से बनाया गया है। सेंड बेस नहीं होने से मैदान हरा रखने में अधिक पानी की जरूरत नहीं होती है। 50 डिग्री गर्मी में भी यहां की घांस सूखती नहीं है। मैदान में ऑस्ट्रेलिया की बरमूडा सीरिज की घांस लगाई गई है।
चौहान के मुताबिक कम पानी में मैदान हरा रहे इसके लिए हम एक विशेष केमिकल का भी उपयोग किया जाता है । इजराइली कंपनी का एक हाईड्रो जेल है जिसका उपयोग मैदान में किया जाता है जिससे कम पानी में अधिक समय तक मैदान में नमी बनी रहती है और घांस हरी रहती है। टेस्ट मैच के लिए मैदान हरा रखने के लिए विशेष तैयारियां की जा रही है। मैदान में एक लाल मिट्टी का नया पिच भी बनाया गया है, लेकिन उस पर टेस्ट मैच नहीं होगा। मैच पुराने विकेट पर ही कराया जाएगा। नई पिच अभ्यास मैच के लिए बनाई गई है।