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प्राधिकरण की जमीन हथियाने की साजिश

पटवारी की रिपोर्ट भी आइडीए के हक में तहसीलदार उतावले हो रहे नामांतरण के लिए

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Ida

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इंदौर।
खजराना में आइडीए की योजना में शामिल जमीन को हथियाने की साजिश के बीच पटवारी की रिपोर्ट भी प्रारंभिक रूप से आइडीए के हक में ही है। इसके बाद भी तहसीलदार इस जमीन का नामातंरण उनके नाम करने को उतावले नजर आ रहे हैं, जिनका जमीन से लेना-देना नहीं है।

खजराना की जमीन खसरा नंंबर 57/१४६५ मिन-2 की कुल रकबा ०.१५० हेक्टेयर जमीन के नामांतरण के लिए जब्बार खान के वारिसान ने तहसीलदार विजय नगर को आवेदन दिया। तहसीलदार ने आवेदन स्वीकार कर नामांतरण के लिए कार्रवाई भी शुरू कर दी और आइडीए से अभिमत मांग लिया। आइडीए ने जमीन पर दावा न करते हुए मौका निरीक्षण करवाने को लिख दिया। इसके बाद पटवारी से मौका निरीक्षण करवाया गया। पटवारी ने रिपोर्ट में लिखा है कि खसरा नंबर मूल ५७/1465 का निरीक्षण किया गया। इसमें खसरा नंबर ५७/१४६५ मिन-1 शहरी सीलिंग के नाम पर है और ५७/१४६५ मिन-2 इंदौर विकास प्राधिकरण के नाम से दर्ज है। इसके बाद शहरी सीलिंग रिकॉर्ड, बटांकन और आइडीए की योजना में शामिल जमीन के लिए पास अवार्ड व अन्य दस्तावेज देखने को कहा।

बिना ऋण पुस्तिका आवेदन ले लिया
यह रिपोर्ट पटवारी ने तीन दिन पहले ही सौंपी। यह तो तय हो गया कि जमीन प्राधिकरण और सीलिंग के नाम पर है। जिन लोगों ने जमीन के नामांतरण का आवेदन किया, उनके पास ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है, जो सिद्ध कर सके कि जमीन उनकी है। यहां तक कि ऋण पुस्तिका, जो ऐसे आवेदनों के साथ लगाना जरूरी होती है, वह भी जमीन पर दावा जताने वालों के पास नहीं है। ऐसे में तहसीलदार की भूमिका भी संदेह के घेरे में आ रही है कि उन्होंने नामांतरण का आवेदन किस आधार पर लिया।

शेष जमीन भी मांगी आइडीए ने

आइडीए ने उक्त खसरे की ०.२३० जमीन का अर्जन किया था। चूंकि उक्त खसरा नंबर की सारी जमीन ही सरकारी थी, लेकिन उस समय भी आइडीए के हक में पूरी ०.२३० हेक्टेयर जमीन नहीं चढ़ी, बल्कि ०.१५० हेक्टेयर ही दर्ज हुई। शेष बची ०.६१ हेक्टेयर जमीन अब भी शासकीय ही है। हाल ही में आइडीए ने कलेक्टर को पत्र लिख दिया कि शेष जमीन भी उनके नाम से दर्ज की जाए। आइडीए ने यह भी कहा कि जिसने जमीन नामांतरण के लिए आवेदन किया, उसके नाम तो जमीन कभी थी ही नहीं। ऐसे में इस तरह का आवेदन लिया जाना ही गलत है।