
भजनलाल बुरानी
इंदौर. पाकिस्तान से नहीं हम हिंदुस्तान के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में आए थे। सन् 1947 की बात है, जो मेरे लिए कल की बात जैसी। बुढ़ापे में खूबसूरत बचपन ज्यादा याद आता है। हमारा घर सिंधु नदी के किनारे सख्खर में था। पिताजी की शाही बाजार में कपड़े की बड़ी दुकान थी। हमारा बड़ा-सा घर था, ग्रामाफोन था। सिंधु की रेत में खेलते थे। परिवार के साथ सिंधु का नौकाविहार और टापू पर बने आश्रम में जाना, यह दृश्य अब भी मेरी आंखों के सामने घूमता है। 1945-46 के समय बंटवारे की आवाज उठने लगी थी।
पिताजी अखबार पढऩे के शौकीन थे, उन्होंने परिवार से कहा कि हमें यह हिस्सा छोड़ हिंदुस्तान के दूसरे हिस्से में जाना चाहिए। मकान की कीमत 20 हजार लगी थी, सोचिए कितना बड़ा मकान होगा। मां नहीं मानी, उन्हें सख्खर से प्यार था। सख्खर ही नहीं पूरे सिंध के लोग खुद को हिंदू-मुस्लमान नहीं वरन राजा दाहरसिंह की संतान मानते थे। एका था। मां को अपने मुस्लिम पड़ोसियों पर पूरा भरोसा था। वो जिद्द पर अड़ी रहीं। हम सख्खर में ही रहे। उस समय सभी को गांधी जी की बातों पर विश्वास था। उन्होंने कहा था ‘बंटवारा मेरी लाश पर होगा’ लेकिन ऐसा हुआ नहीं। सख्खर में दंगे हो गए, हमें घर-बार-दुकान छोड़ कराची का रुख करना पड़ा।
पिताजी ने जितना धन था, वह अपने साथ रखा। कराची से स्टीमर की टिकट लेकर हम बंबई पहुंचे। 6-7 साल का बच्चा था मैं, नाव छोडक़र स्टीमर में बैठने में बड़ा मजा आ रहा था। उस समय समझ नहीं थी कि सिंधु का साथ छूट रहा है। यह मजा बहुत बड़ी सजा में तब्दील होने वाला है और हम आजादी से पहले, 15 अगस्त से पहले ही मुंबई पहुंच चुके थे। मां-पिताजी के जेहन में एक ही बात थी, दंगे थमने के बाद वे जल्द ही वापस सिंध अपने सख्खर लौट जाएंगे। यहां का एक वाक्या दिल दहलाने वाला था। मेरा छोटा भाई जो 15 दिन का था। भूख से रो रहा था। कुछ लोग उसे मां के पास से ले गए। हमारी ट्रेन ग्वालियर के लिए चलने वाली थी, लेकिन वे वापस नहीं आए। मां ने रो-रोकर कोहराम मचा दिया, लगा हमने अपना भाई खो दिया। ये स्वयंसेवक संगठन के लोग थे। भाई को चुप करा, दूध पिला हमारे लिए खाना लेकर आए थे। मुंबई में उस समय बड़ी बिस्किट कंपनी हुआ करती थी- जे बी मंगाराम, पिताजी को लगा वहां काम मिलेगा। वे सभी सख्खर वालों के साथ ग्वालियर पहुंच गए। बिस्किट कंपनी में काम न मिला तो ग्वालियर के महाराजबाड़ा में कपड़े की थान बेचना शुरू किया।
पिता की सख्खर में बड़ी दुकान थी, वे यहां सडक़ पर धंधा कर रहे थे। मां यह देख अकसर दुखी होती थी। 8 भाई और 3 बहन का खर्चा बहुत होता है। हमारी माली हालत खराब होने लगी थी इसलिए हम बच्चों ने भी फेरी लगाना शुरू की। मैंने 7-8 साल की उम्र में गलियों में भटककर दस्ताने और मोजे बेचे। पिताजी ने हार नहीं मानी। हम काम करते और पढ़ते भी। मैंने चिकित्सक की पढ़ाई पूरी की नाम के साथ डॉक्टर लगा तब उन्होंने कहा- हिंदुस्तान के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में आना कड़वा लेकिन अच्छा अनुभव था। ये उनका आशीर्वाद है कि आगे की पीढ़ी अब फल-फूल रही है।
प्रस्तुति - श्रुति अग्रवाल
Published on:
12 Aug 2017 01:41 pm
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