
खुल गए पत्ते ने उजागर की रिश्तों की हकीकत,खुल गए पत्ते ने उजागर की रिश्तों की हकीकत
इंदौर. इंदौर यूनाइटेड राउंड टेबल ने फंड रेजर इवेंट के तहत रविवार शाम लाभ मंडपम में नाटक का मंचन किया। मुंबई के फेलिसिटी थिएटर्स के इस नाटक का मुख्य आकर्षण थे फिल्म, टीवी और रंगमंच के लोकप्रिय अभिनेता राकेश बेदी और अनंत महादेवन। राकेश बेदी इसके लेखक और निर्देशक भी हैं। नाटक में एक परिवार है कॉस्मेटिक सर्जन डॉ. मनोज राय का जिनकी पत्नी मंजू और दो युवा बच्चे हैं। एक बेटा और एक बेटी। मंजू हमेशा चिंता करती रहती है कि बच्चे फोन पर लगे रहते हैं और पढ़ाई में ध्यान नहीं देते। घर में शाम को एक पार्टी है, जिसमें राय के कुछ मित्र सपत्नीक आमंत्रित हैं।
पार्टी में आते हैं शायर जिनका उपनाम है अकेला और उनकी पत्नी सपना, छोटा बिजनेस करने वाले श्याम और ज्योति, एक बुजुर्ग मद्दी अंकल जिनकी अपनी पत्नी से नहीं बनती, इसलिए पार्टी में अकेले आते हैं। एक है बॉब और उसकी भी पत्नी से नहीं बनती इसलिए वह गर्लफ्रेंड शिरीन को लेकर आता है। शिरीन हाई सोसाइटी से है और बाकी सभी उच्च मध्यम वर्ग से हैं। जो हाई सोसाइटी की नकल करने के लिए अपनी हैसियत को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हैं। पार्टी में जब सब लोग अपने-अपने फोन पर लगे रहते हैं तो मेजबान मंजू सबसे अपना-अपना फोन एक टेबल पर रखने को कहती है। तभी शिरीन कहती है कि एक खेल खेला जाए, जिसमें सब अपना-अपना फोन सेंटर टेबल पर रखेंगे और जिसके फोन की घंटी बजेगी वह स्पीकर ऑन कर के बात करेगा। डॉक्टर रॉय इसका विरोध करते हैं। धीरे-धीरे सभी विरोध करते हैं लेकिन मंजू सभी को मना लेती है। सबसे पहला फोन मंजू के पिता का आता है और उनके फोन से पता लगता है कि मंजू के पिता की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। मंजू हर महीने पति से छिपाकर उन्हें रुपए भेजती है। अपनी हर कविता पत्नी के नाम करने वाले शायर की प्रेमिका उन्हें अपने पास बुलाना चाहती है। धीरे-धीरे सभी के फोन बजते हैं और उनके चेहरे के पीछे छिपे चेहरे उजागर होते जाते हैं।
नाटक में शायर अकेला बने थे खुद निर्देषक राकेश बेदी और डॉक्टर बने थे अनंत महादेवन। राकेश बेदी की पत्नी की भूमिका में तन्नू सुनेजा और अनंत महादेवन की पत्नी के रूप में रूपाली गांगुली का अभिनय अच्छा था। हाई सोसाइटी की महिला के रूप में किश्वर मर्चेंट भी सहज थीं।
एक घंटा निरर्थक संवाद, कुछ संवाद अशालीन
नाटक को कॉमेडी नाटक कहा गया, लेकिन शुरू के एक घंटे में बमुश्किल दो-एक बार ही हंसी आई। नाटक में एक घंटा निरर्थक संवादों में ही निकल जाता है। असली कहानी इंटरवल के बाद शुरू होती है। इंटरवल के बाद नाटक कुछ ठीक रहा। नाटक में हालांकि कुछ संवादों की भाषा अशालीन थी जिनसे बचा जाना था, लेकिन नाटक में उन्हें दोहराया भी गया।नाटक का पहला घंटा सख्त एडिटिंग के जरिए आधा किया जाता तो बेहतर होता।
Published on:
03 Feb 2020 01:27 am
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