21 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल : दौर कोई सा भी हो हिंदी नई ही रहेगी

ममता कालिया, भगवानदास मोरवाल, निलोत्पल मृणाल, यतींद्र मिश्रा ने की चर्चा

7 min read
Google source verification

इंदौर

image

Hussain Ali

Dec 23, 2018

Indore Literature Festival

इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल : दौर कोई सा भी हो हिंदी नई ही रहेगी

इंदौर. इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल में दूसरे दिन शनिवार को साहित्यकारों ने विचारों का आदान-प्रदान किया। वे पाठकों से रूबरू हुए और उनकी जिज्ञासाओं को शांत किया।
लेखक भगवानदास मोरवाल ने हिंदी का बदलता कहन और मुहावरा सत्र पर चर्चा की शुरुआत करते हुए कहा, जीवनशैली के साथ भाषा में भी तेजी से बदलाव आया है। कहन या मुहावरा हर लेखक की अपनी एक पहचान होती है। पाठक मेरी रचना कभी भी पढ़े, कहने की शैली ऐसी बन जाती है कि वह पहचान जाता है, यह रचना भगवानदास लिख रहा है। भाषा नई या पुरानी नहीं होती, यह लेखक की अपनी शैली होती है, शैक्षिक संस्कार होते हैं। जिस इलाके से मैं संबंध रखता हूं, जीवन अनुभव होंगे, मेरी रचना में मुहावरा कहन की शैली भी मेरी अपनी होगी।
यतींद्र मिश्रा ने कहा, हर समय की भाषा मुहावरा, कहने का ढंग बदलता है। भारतेंदु मंडल की कविता सबसे समकालीन थी। फिर द्विवेदी युग आया तो बहुत चीजें चलन से बाहर हो गई। जो भाषा तुलसीदास के समय में समकालीन थी, वह अब क्लासिक हो गई है। हो सकता है २५ साल बाद आज की भाषा का स्वरूप भी बदल जाए। भाषा अपना संस्कार ग्रहण करती है और समय के साथ समकालीन हो जाती है। नई चलन की हिंदी हमेशा रहेगी। भारतेंदु, निराला, अज्ञेय, यतींद्र मिश्रा हो या निलोत्पल मृणाल का जमाना, हिंदी नई रहेगी। लेकिन कहकर आइसोलेट करना, बताना कि हम नई हिंदी लेकर आए हैं, यह गलत है। यतींद्र मिश्रा की लिखी किताब लता सुर गाथा को फिल्म लेखन पर राष्ट्रीय पुरस्कार मिला है। १२ साल बाद हिंदी की किसी किताब को यह सम्मान मिला है।

युवा लेखकों को अपशब्द या विकृत शब्दों से परहेज नहीं
लेखिका ममता कालिया ने कहा, हमारे समाज में सबसे ज्यादा तकलीफ अंग्रेजी शब्दों से होती है। आंचलिक, क्षेत्रीय यहां तक उर्दू शब्दों से भी परेशानी नहीं होती। हम यह सोचते हैं कि अंग्रेजी हमारी भाषा को भ्रष्ट करने के लिए है। समाज में हमारे अभिव्यक्ति के तरीके ऐसे हो गए कि अंग्रेजी हर तरफ यूज करने लगे हैं। अंग्रेजी का इस्तेमाल रौब झाडऩे के लिए करते हैं। नए युवा लेखक अपनी कहन में बदलाव लेकर आए हैं। अपशब्द या विकृत शब्दों से परहेज नहीं करते। ये जरूर है कि साहित्य के ऊपर जिम्मेदारी है कि हम अपनी भाषा में इतने विकार न लाएं कि उसे स्वीकार न किया जाए। भाषा के प्रति एक प्रत्याशा और एक जिम्मेदारी भी रहती है। अगर साहित्यकार, विचारक, शिक्षक लेखक भाषा के प्रति सावधान नहीं रहते तो कौन रहेगा। नए लेखक नई हिंदी लेकर आ रहे हैं लेकिन उन्हें भी भाषा के प्रति थोड़ा ध्यान देना होगा।

युवा लेखक ध्यान रखें, भाषा के सौंदर्य और लालित्य से छेड़छाड़ न हो
युवा लेखक निलोत्पल मृणाल ने कहा, व्यक्ति अपने समय की भाषा में किताब लिखता है। सीखना एक प्रक्रिया है जो अभ्यास से आता है। अगर हम यह बैरियर लगाएंगे कि गलत इस्तेमाल के कारण भाषा का उपयोग न करें तो सीखने की प्रक्रिया रुक जाएगी। पूरी दुनिया योग को योग, त्रिशूल को त्रिशूल, मृदंग को मृदंग कहती है। गीता के श्लोक भी जस के तस रहते हैं, क्योंकि दुनिया में जो चीजें जहां से आएंगी, वहां के नामों से ही पुकारी जाएंगी। ग्लोबलाइजेशन में भाषा का दरवाजा भी खुलेगा। हमें भाषा की शुद्धता के नाम पर रोक-टोक न कर उदार होना होगा। युवा लेखकों को इतना ध्यान तो रखना होगा कि हर भाषा का एक सौंदर्य होता है, लालित्य होता है, उसको बिना छेड़े भी काम किया जा सकता है। हमें हिंदी को खत्म नहीं करना है। हिंदी हिंदुस्तान की सभी बोलियों की साझा संस्कृति का नाम है।

एक बूंद सहसा उछली : यात्रा वृत्तांत
हिंदी में वाइल्ड लाइफ पर लेखन नहीं होता
आइएलएफ में यायावरी- घुमक्कड़ी पर सेशन का नाम रखा गया, एक बूंद सहसा उछली जो अज्ञेय की एक किताब का शीर्षक है। यह किताब अज्ञेय ने यात्रा वृतांत के रूप में लिखी है। इस सेशन में हिमालय की यात्राएं करने वाले डॉ. अजय सोडानी, संदीप भूतोडि़या चर्चाकार रहे। सूत्रधार थे डॉ अपूर्व पुराणिक। भूतोडि़या ने कहा, यात्रा वृतांत हिन्दी में बहुत कम हैं। अंग्रेजी में यह हमेशाा से था और है। अमरीका, इंग्लैंड के अधिकांश अखबारों में ट्रैवलॉग का नियमित कॉलम होता है। आजकल वाइल्ड लाइफ टे्रवलिंग बहुत लोकप्रिय हो रही है पर हिन्दी में वाइल्ड लाइफ पर लेखन होता ही नहीं है। मप्र और राजस्थान जैसे हिन्दी प्रदेशों में टाइगर देखने दुनियाभर के पर्यटक आते हैं पर टाइगर पर हिन्दी में एक भी किताब नहीं मिलती। मैंने वाइल्ड लाइफ पर जो किताब लिखी वह हिन्दी में तो कम बिकी पर अंग्रेजी में खूब बिकी।
डॉ. सोडानी ने कहा, 17 बरसों से हिमालय की मेरी यात्रा पूरी नहीं हो रही है, क्योंकि हिमालय मुझे आगे नहीं जाने दे रहा। हिमालय पर आप खुद नहीं जा सकते। आप प्रकृति को चैलेंज नहीं दे सकते। हिमालय ने जो मुझसे लिखवाया वही मैंने लिखा है। उन्होंने कहा, कालिदास ने मेघदूतम में यात्रा वृतांत ही लिखा है पर हमने उसे मिथ में शामिल कर लिया। दरअसल यात्रा वृतांत यात्री की दृष्टि है, जो यात्रा के दौरान ग्रहण करता है। जब मैं पहली बार हिमालय गया तो पाया कि वहां हर व्यक्ति के पास कुछ न कुछ कथा है।

समय के अनुसार पाठकों की रुचि समझने की दृष्टि ही आपको बना सकती है बेस्टसेलर
सुंदरी वेंकटरमन, केविन मिसल, अनंत विजय और तोमोको किकुचि ने रखे विचार
इस सेशन में अनंत विजय ने कहा, जिंदगी और साहित्य में शॉर्टकट जैसी कोई चीज नहीं होती। शॉर्टकट पर चलवने वाली चीजे लंबे समय तक नहीं चल पाती। कोई लेखक बेस्टसेलर बनने का तरीका गूगल पर नहीं तलाशता। आज तक इस फॉर्मूले को भी कोई समझ नहीं पाया है। बेस्टसेलर पाठकों की रुचि पर आधारित होता है। अगर समय के अनुसार पाठकों की रुचि को समझने की दृष्टि आपके अंदर है, समय को अपनी रचना में स्थान दे रहे हैं तो आप बेस्टसेलर हो सकते हैं। 22 साल के युवा लेखक केविन मिसल ने कहा, मेरी बुक बेस्टसेलर अपने कंटेंट, माउथ पब्लिसिटी और सुंदर कवर के कारण हुई है। किसी भी बुक के लिए कंटेंट सुप्रीम होता है। फिर वर्ड ऑफ माउथ से अच्छी पब्लिसिटी कोई नहीं होती। इसके बाद स्टोर्स पर शेल्फ स्पेस लेना चुनौती होती है। हजारों बुक्स के बीच अच्छी स्पेस लेना जरूरी है, क्योंकि नए लेखकों के मामले में जो दिखता है, वह बिकता है वाली कहावत सही होती है। किताब का कवर अच्छा नहीं है, अच्छी स्पेस नहीं मिली है तो किसी को पता नहीं चलेगा।
उ²ेश्य, मैसेज और विजन होना चाहिए
जापानी किताबों की हिंदी ट्रांसलेटर तोमोको किकुचि ने कहा, 30 साल पहले हिरोशिमा हादसे पर लिखी किताब आज भी बिक रही है। इसकी कहानी, लिखने की शैली, फोटो हर चीज आकर्षित करती है। मुझे लगता है इसमें सबसे प्रमुख कारण है लेखक तोशी का उद्देश्य। हिरोशिमा हादसे के बाद जब मौके पर गए, तो उन्हें लगा कि सच्चाई लोगों के सामने आनी चाहिए। लोगों को भी किताब के विजुअल, विजन, कवर और मैसेज अच्छा लगा, इसलिए यह बेस्टसेलर बनी।
सेल्फ पब्लिकेशन अच्छा विकल्प है
31 बुक लिख चुकी सुंदरी वेंकटरमन ने कहा, उन्हें पहली किताब के लिए पारंपरिक पब्लिशर्स ने कई बार रिजेक्ट किया। कई बार रिजेक्ट हुई, लेकिन हताश नहीं हुई। इसके बाद सेल्फ पब्लिशिंग की। ब्लॉग पर पोस्ट करना शुरू किया। लोगों ने नोटिस किया और पसंद करने लगे। हर हफ्ते एक नया चैप्टर लिखने लगी। किंडल पर भी बुक पब्लिश की। आज पब्लिशर खुद आ रहे हैं। हालांकि आप पब्लिशर को दोष नहीं दे सकते, पर किताब छपने से आप मोटिवेट होते हो, अधिक लिखने लगते हो।

अगर सरल भाषा पढऩा है तो अखबार ही पढऩा चाहिए
निकिता गोयल, बेली कानूनगो, गरिमा दुबे, इंदिरा दांगी, सोनल मल्होत्रा, निखिलेश मिश्रा ने की चर्चा
द फस्र्ट ड्राफ्ट, द फस्र्ट नोट : इन द जर्नी ऑफ ए राइटर सेशन में शहर की लेखिका गरिमा दुबे ने कहा, अगर सरल भाषा पढऩा है तो अखबार ही पढ़ें। साहित्य की बात आती है तो थोड़ा लास्य, लालित्य होना चाहिए। आप परोसे तो सही, बच्चे समझेंगे। यंग राइडर निकिता गोयल ने कहा, उन्होंने सोनल मल्होत्रा के साथ किताब लिखी है। इसका आइडिया लोगों से ही मिला है। विदेश में पढ़ाई करने व रहने की इच्छा रखने वालों की परेशानियों ने हमें किताब लिखने के लिए प्रेरित किया है। हमारी किताब में फॉरेन के बेसिक मेनर से लेकर फाइनेंस, पैकिंग, जॉब्स आदि सेक्टर्स को कवर किया है। पेशे से केमिकल इंजीनियर निखिलेश मिश्रा ने कहा, केमिकल इंजीनियरिंग पर बेसिक नॉलेज किसी के पास नहीं है, इसलिए विचार आया कि इस पर किताब लिखूं। इसके बाद प्रेरित हुआ और अन्य विषयों पर लिखने की सोची। फिर युवा महिला के नौकरी में संघर्ष पर किताब लिखी। हालांकि साहित्य से मेरा कोई वास्ता नहीं था। युवा लेखिका बेली कानूनगो ने इमोशनल और क्रिएटिविटी पर बुक इमोटिविटी लिखी। उन्होंने कहा, बुक में बताया है कि कैसे इमोशन हमारी क्रिएटिविटी को प्रभावित करते हैं। मेरी जर्नी है, जिसमें अड़चनों को पार करने की कहानी है। किताब बेचना मेरा उद्देश्य कभी नहीं रहा है। बस चाहती हूं कि यह सही पाठकों तक पहुंचे, ताकि उन्हें मदद मिले। यह बुक राइटिंग या अन्य किसी क्रिएटिवीटी सेक्टर में उतरने वाले युवाओं की मदद के लिए है।

काव्य पाठ
प्रेम के लिए जगह जरा कम है...
प्रेम के लिए जगह जरा कम है डर के लिए थोड़ी ज्यादा
डरते-डरते हमने प्रेम किया, अक्सर इतना डर कर
कि उसे बताने और जताने में भी डरते रहे,
अंत में हमारे पास प्रेम नहीं रहा,
अंत मंे हमने इस डर से ही पे्रम किया,
अंत में हम प्रेम से ही डरने लगे।
सूत्रधार आशुतोष दुबे ने यह कविता आइएलएफ के कविता प्रवाह सत्र में सुनाई। इसी सत्र में प्रो. सरोज कुमार ने कविता पढ़ी, ‘वे मेरी कविता सुनने नहीं आए हैं, समारोहों में सज-धजकर जाना और कविता तक आना दो अलग-अलग बातें हैं, वे कल मुझे सर्कस में मिले थे, जोकरों की फूहड़ तुकबंदी पर उछल-उछलकर दाद देते हुए, जोकरों में कविता खोजने वाले कविता में जोकर खोजने आते हैं।’
विवेक चतुर्वेदी की कामकाजी स्त्रियों पर लिखी कविता स्त्रियां घर लौटती हैं भी काफी पसंद की गई। ‘स्त्रियां घर लौटती हैं पश्चिम के आकाश में हुई आकुल वेग उड़ती काली चिडि़यों की पांत की तरह, स्त्रियों का घर लौटना पुरुष का लौटना नहीं है, पुरुष लौटते हैं बैठक में फिर गुसलखाने में फिर नींद के कमरे में स्त्री एक साथ पूरे घर में लौटती है, वह एक साथ आंगन से चौके तक लौट आती है वह, लौटती है रोटी बनकर बच्चे की भूख में, स्त्री लौटती है दाल-भात में, टूटी खाट में जतन से लगाई मसहरी में, स्त्री है तो बस रात की नींद में नहीं लौट सकती, उसे सुबह की चिंताओं में भी लौटना आता है...। रश्मि रमानी और डॉ. दीपा मनीष व्यास ने भी कविताएं पढ़ीं।