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होलकरकालीन सिनेमाघर रीगल पर अब हमेशा के लिए ताला, 85 साल पुराना है इंदौर का यह टॉकीज

-गिरा पर्दा: इंदौर के साथ सेंट्रल इंडिया के ‘बॉक्स ऑफिस’ की रील हमेशा के लिए पेटी में बंद -होलकर राज में मनोरंजन केंद्र के लिए 193० में जमीन लीज पर दी गई -1934 में उषाकिरण टॉकिज शुरू हुआ, अब यहां बनेगा मेट्रो स्टेशन-पार्किंग  

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इंदौर

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Reena Sharma

Sep 18, 2019

होलकरकालीन सिनेमाघर रीगल पर अब हमेशा के लिए ताला, 85 साल पुराना है इंदौर का यह टॉकीज

होलकरकालीन सिनेमाघर रीगल पर अब हमेशा के लिए ताला, 85 साल पुराना है इंदौर का यह टॉकीज

इंदौर. रीगल टॉकिज की लीज समाप्त होने के बाद मंगलवार को नगर निगम ने बिल्डिंग के बाद साढ़े 11 बजे मुख्य द्वार को सील किया। अपर आयुक्त देवेंद्रसिंह, उपायुक्त प्रतापसिंह सोलंकी, लीज शाखा के अधिकारी मनीष पांडे, उपायुक्त रिमूवल महेंद्रसिंह चौहान सहित निगम का रिमूवल अमला पुलिस बल के साथ सुबह 10 बजे कब्जा लेने पहुंचे। टॉकिज प्रबंधन ने विरोध जताया, लेकिन निगम अफसरों ने उन्हें एक तरफ कर दिया। निगम अमले ने कब्जा लेते हुए यहां मौजूद फिल्मों के पोस्टर फाडऩे के साथ मालिकाना हक के पोस्टर लगा दिए।

ज्ञात रहे एसडीएम कोर्ट ने बीते सप्ताह कब्जा लेने के लिए निगम को आदेश जारी किए थे। हाईकोर्ट में चल रहे केस में भी सोमवार को कब्जे पर स्टे के आवेदन को खारिज कर दिया गया। प्रभारी नगर निगम आयुक्त और लीज शाखा प्रभारी अपर आयुक्त एस कृष्ण चैतन्य ने अपर आयुक्त देवेंद्रसिंह को इसका कब्जा लेने के लिए निर्देश जारी किए। इसके बाद निगम ने मंगलवार को कार्रवाई की।

1934 में उषाकिरण टॉकिज के नाम से शुरू हुआ, जिसका नाम बाद में रीगल हो गया। उषाकिरण टॉकिज के पहले मैनेजर मिस्टर स्मिथ थे। 7 अप्रैल 1934 में यहां पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र लगी थी। इस फिल्म को देखने के लिए तत्कालीन बड़ौदा महाराजा गायकवाड़ पहुंचे, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिल पाई थी। इसके बाद होलकर राजाओं ने उन्हें रेलवे स्टेशन के सामने जमीन दी, जिस पर उन्होंने यशवंत और बेम्बिनो टॉकिज बनवाए थे। हर दौर के बड़े अभिनेता यहां आए। 16 सितंबर 2019 को फिल्म ड्रीमगर्ल के आखिरी शो के साथ टॉकिज बंद हो गया।

2 हजार फिल्में लग चुकीं, सबसे ज्यादा 7 महीने चली प्यार झुकता नहीं

-होलकर स्टेट के लिए क्रिकेट खेल चुके कर्नल सीके नायडू ने टॉकीज का उद्घाटन किया था। एक अंग्रेज मिस्टर स्मिथ

-पहले मैनेजर बनाए गए थे। होलकर राज परिवार के लिए यहां बालकनी में एक राजसी सीट तय थी।

-सुपर स्टार देवानंद 1965 में फिल्म गाइड के प्रमोशन करने आए तो रीगल भी गए थे।

-गुलजार भी अपनी फिल्म माचिस का प्रमोशन करने यहां आए थे।

-1 अप्रैल 1934 में शुरू हुई रीगल टॉकीज में 2 हजार से ज्यादा फिल्में लग चुकी हैं। मिथुन अभिनीत प्यार झुकता नहीं सात महीने चली थी।

चार पीढिय़ों की यादों का साथ

केवल सूट पहनकर ही बैठ सकते थे इस टॉकिज की बालकनी में

जफर अंसारी, गेस्ट राइटर @ मंगलवार को रीगल सिनेमाघर पर निगम का कब्जा होने के बाद शहर की परंपरा भी खत्म हो गई, जो 85 बरस के इतिहास से जुड़ी है। 1934 में बना यह टॉकिज सेंट्रल इंडिया का पहला सर्वसुविधायुक्त आधुनिक थिएटर था। वैसे शहर में प्रकाश, श्रीकृष्ण टॉकिज रीगल से भी पुराने थे लेकिन रीगल की बात ही कुछ और थी। इस टॉकिज की बालकनी में बिना सूट-टाई पहने दर्शकों को प्रवेश ही नहीं मिलता था। राज परिवार के सदस्यों के लिए विशेष बॉक्स बने थे। हर साल यशवंत राव होलकर के जन्मदिन पर बच्चों को मुफ्त में फिल्म दिखाई जाती थी और उन्हें मिठाई भी बांटी जाती थी।

उस वक्त शास्त्री ब्रिज नहीं बना था और इसके सामने सडक़ थी, पास ही में ऑक्ट्राय नाका था। रीगल के पीछे विलियम बिस्को पार्क था, जिसे अब हम नेहरू पार्क के नाम से जानते हैं। शहर के तफरीह प्रेमी और सिनेमाप्रेमी लोग छुट्टी के दिन सपरिवार पहले बिस्को पार्क की सैर करते फिर फिल्म देखकर घर जाते थे। यहां एक रेस्त्रां भी था। रीगल के पास ही मिल्की-वे टॉकिज था, जिसमें केवल इंग्लिश फिल्में ही लगती थीं। दिलीप कुमार और गुरुदत्त जैसे अभिनेता भी यहां फिल्म के प्रचार के लिए आए हैं।

केवल सिनेमाघर नहीं, इंदौर की पहचान हो गई सील

रीगल सिर्फ टॉकिज नहीं, शहर का माइलस्टोन या कहें पहचान था। शहर से अपरिचित कोई इंदौर आए तो उसे कहते थे रीगल टॉकिज पहुंच जाना..। शहरवासियों के लिए मनोरंजन का केंद्र होने से इसके कारण आसपास का पूरा इलाके को पहचान मिली। शहर के मध्य में होने से शहर की धुरी था। इतवारिया बाजार में रहने वाले सराफा कारोबारी धन्नजी मनजी ने इसे शुरू किया था। संजय सेतु के पास स्थित प्रकाश टॉकिज भी उनका था।

पहले प्रकाश और अब रीगल भी बंद हो गया। इंदौर में श्रीकृष्ण और रीगल के बाद ही कई टॉकिज शुरू हुए। इंदौर में फिल्मों का क्रेज इतना हुआ करता था कि नजदीकी चौराहों तक के नाम भी टॉकिजों के नाम से प्रसिद्ध हो गए थे। इनमें एमजी रोड का रीगल तिराहा, आरएनटी मार्ग का मधुमिलन चौराहा, मालवा मिल से आगे बढऩे पर नीलकमल चौराहा, चंद्रगुप्त चौराहा जैसे आदि शामिल हैं। फिल्मों का क्रेज होने के चलते ही कई फिल्म वितरकों ने अपने ऑफिस ही नहीं सिनेमाघर भी बना लिए थे। फिल्म इंडस्ट्री में बांबे जहां फिल्में बनती थी, जैसी इज्जत इंदौर की भी थी, क्योंकि यह पूरे सेंट्रल इंडिया में फिल्मों के प्रदर्शन को तय करता था। पहले यहां फिल्म गुरुवार को ही लगा दी जाती थी, जिससे इंदौर की जनता उसके बारे में राय दे पाए। फिल्म वितरकों की पसंद भी रीगल ही था।

-डॉ. विजयसेन यशलाहा, पूर्व अधीक्षक रॉबर्ट नर्सिंग होम