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‘इंदौर स्कूल ऑफ आर्ट ने कलाकारों को किसी सांचे में नहीं ढाला’

देश के कला जगत की बहुत सी बातें जो अगली पीढ़ी तक पहुंचनी चाहिए वो नहीं पहुंच सकीं।

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इंदौर. आज के दिन मुझे लगता है कि मैं उस कॉलेज के बारे में कुछ बातें करूं जिस पर अकसर हमारा ध्यान नहीं जाता है। इसका दूसरा कारण यह भी है कि आजादी के बाद हमारे देश में कला आलोचक की भूमिका निभाने में सक्षम कोई आलोचक अभी तक हुआ नहीं। इस कारण से देश के कला जगत की बहुत सी बातें जो अगली पीढ़ी तक पहुंचनी चाहिए वो नहीं पहुंच सकीं।

मैं जिस कॉलेज की बात कर रहा हूं उसे अब शासकीय ललित कला संस्थान कहा जाता है। 1927 में प्रसिद्ध चित्रकार दत्तात्रय दामोदर देवलालीकर ने होलकर महाराज के आमंत्रण पर इसकी स्थापना की। देवलालीकर साहब पहले कलाकार थे जिन्होंने मध्यप्रदेश में समकालीन कला के प्रति चेतना जगाई। इसके बाद 1954 में ग्वालियर में कला महाविद्यालय की शुरुआत की। देवलालीकर की जलाई अलख से जबलपुर में भी कॉलेज शुरू हुआ।

नैसर्गिक प्रतिभा को खिलने का मौका
स्कूल के लिए अकसर यह पूछा जाता रहा कि चित्रकला में इस स्कूल की कौनसी वो शैली है जिससे पहचाना जा सके कि यह विद्यार्थी इंदौर स्कूल का है। देश में मौजूद अन्य कला संस्थान अपनी शैली के कारण पहचाने जाते हैं। शांति निकेतन से पढ़ा विद्यार्थी सहज ही अलगाया जा सकता है, जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से निकले छात्र के बरक्स या मद्रास स्कूल की भिन्नता बड़ौदा स्कूल से। ये महाविद्यालय अपनी शिक्षा-शैली पर गर्व करते हैं, लेकिन विद्यार्थी की प्रतिभा का तिरस्कार भी करते हैं। विद्यार्थी को पता भी नहीं होता कि उसे एक सांचे में ढाला जा रहा है। उससे यह उम्मीद है कि वह अपने वैशिष्ट्य को तज, अपनी प्रतिभा को कुंद कर, विद्यालय की शैली में काम करें। यह कुछ इस तरह का है कि छात्र कच्ची मिटटी है, उसमें कोई गुण नहीं है, उसे कलाकार बनाना है। एक खास तरह का कलाकार जिसके चित्र देखकर दर्शक जान सके कि यह किस फैक्टरी का उत्पाद है। इन अर्थों में ये बहुप्रसिद्ध कला विद्यालय अपनी शैली के चक्रव्यूह में फंस गए, जिससे बाहर निकालने के लिए वहां कोई देवलालीकर मौजूद नहीं है।

इंदौर स्कूल की शैली, वैयक्तिक प्रतिभा के विस्तार, निखार और उत्खनन के लिए डाली गई वो नींव है जिस पर प्रश्न उठाना अपने को ही नीचा दिखाने जैसा होगा। बेन्द्रे, हुसैन, नाना वैद्य, एमजी किरकिरे, डीजे जोशी, रामजी वर्मा, रामनारायण दुबे, विष्णु चिंचालकर, एमटी सासवडकर, तात्या वनकर, चंद्रेश सक्सेना अपनी विशिष्ट कला प्रतिभा के कारण जाने गए। देवलालीकर साहब ने उनके खास गुण, स्वभाव को परख कर उन्हें उसी दिशा में बढ़ाया। ये सब कलाकार एक जैसे नहीं हैं और न ही ये देवलालीकर साहब की तरह के चित्र बनाते हैं। मैं यहां पर अनेक नाम लिख सकता हूं किन्तु यह नाम गिनाने के लिए नहीं बल्कि देवलालीकर साहब की पैनी नजर के विस्तार को याद करने का अवसर है। अच्छे शिक्षक के गुणों के साथ ही वे कला स्वभाव को समझते थे

यहां के कलाकारों ने शुरू की कला की धाराएं
यदि आज भारतीय समकालीन कला परिदृश्य पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि तीन प्रमुख धाराएं हैं जिनमें अनेक कलाकार अपने को बरत रहे हैं। कथात्मक चित्र परंपरा जिसकी शुरुआत बेन्द्रे से हुई और शैलीगत चित्र परंपरा हुसैन से शुरू से होती है। इसका विस्तार वे इतना करते हैं कि आज भी कला महाविद्यालय में जाने वाला हर छात्र हुसैन बनने का सपना लिए ही जाता है।
(अखिलेश समकालीन भारतीय चित्रकला के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। वे ७० के दशक में ललित कला संस्थान के विद्यार्थी रहे हैं।)

बेन्द्रे और हुसैन के गुण पहचाने
इंदौर स्कूल अपने वैशिष्ट्य के कारण ज्यादा खिला और खुला स्कूल बना। देवलालीकर साहब बेहद संवेदनशील और विलक्षण चित्रकार थे। वह कठोर शिक्षक के रूप में ख्यात रहे, गुस्सा उनकी नाक पर बैठा रहता था। वह हर शिष्य को उसकी प्रतिभानुसार उसे पढ़ाते। उनके प्रमुख विद्यार्थियों के चित्र आप देखें तो यह बात ज्यादा स्पष्ट हो सकती है। दो प्रमुख शिष्य पहली बैच के एनएस बेन्द्रे और तीसरी बैच के मकबूल फिदा हुसैन के चित्रों को देखें तो ये स्पष्ट हो जाता है कि देवलालीकर साहब ने बेन्द्रे को रंग-अवकाश की शिक्षा दी तो हुसैन को रेखाओं की ताकत से परिचित कराया। एमएस जोशी को अलंकरण का महत्व समझाया तो डीजे जोशी को विहंगम को साधना बताया। उनके बाद इस प्रतिभा के धनी चंद्रेश सक्सेना ही हुए जिनमें यह गुण था कि वे प्रत्येक विद्यार्थी की सीमा और क्षमता को जानते थे।