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लडक़ों की कमी, फिर भी जैन धर्म में लड़कियां ही क्यों ले रही दीक्षा

अभी तो टूटे थे दूध के दांत और चली वैराग्य की राह, नौ वर्षीय बाल मुमुक्षु से लेकर 75 वर्षीय मातुश्री भी ऐश्वर्य छोडकऱ चली संयम और वैराग्य की राह पर

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इंदौर

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Amit Mandloi

Mar 04, 2018

jainism india

इंदौर. अपने पिता की लाड़ली और भाई की इकलौती बड़ी ९ वर्षीय बहन का संत बनने का निर्णय सिर्फ पिछले ६ माह में लेकर परिवार के लिए खुशी का माहौल लेकर आया। अपने पापा और गुरु का नाम रोशन करने के लिए वह जैन दीक्षा लेने के लिए काफी आतुर दिखी। अब वह अपने माता-पिता के साथ नहीं रहते हुए अपनी गुरु बहन के गले लगकर बार-बार यह सांसारिक जीवन को त्याग कर संयम और वैराग्य की राह पर चलने के की बात कहती दिखाई दी।


जिला झाबुआ के थांदला निवासी पंकज तांतेड व सीमा की बेटी प्रियांशी (परी) कक्षा तीसरी में पढ़ती है और वह अब जैन शिक्षा और दीक्षा लेना चाहती है। प्रियांशी ने बताया कि वे उनकी परिवार के साथ अर्पितगुणाश्रीजी मसा के चातुर्मास के लिए गई थी और तभी से जैन उपाश्रय जाकर उनसे मिलने लगी। जैन साध्वियों के संपर्क में आने का प्रभाव यह हुआ कि मात्र ६ माह में वह उनसे न केवल धुलमिल गई बल्कि उसने भी इस संसारिक जीवन को त्यागने का निर्णय भी ले लिया। जीवं हिंसा रोकने के लिए अब वह कुछ करना चाहती है। अपने पिता व गुरु का नाम रोशन करना ही उनका उ²ेश्य है। अभी तक ३५० किलोमीटर का विहार साध्वियों के साथ किया और रोज ५ बार सामायिकी भी कर रही है। अभी तक दो प्रतिक्रमण भी कर चुकी है। मुमुक्षु प्रियांशी पिछले एक सप्ताह से विश्वरत्न सागर महाराज से जिद कर रही थी उसे जल्दी दीक्षा दिलवाई जाए। साध्वी अर्पित गुणाश्रीजी की शिष्या बनेगी।

आज दसवीं की परीक्षा पर लेंगी दीक्षा
दूसरी दीक्षा इंदौर के नगीन नगर निवासी गौरी भाई और पार्वती बेन की पुत्री शिवानी की होगी जो 18 वर्ष की हैं। शिवानी ने 10वीं बोर्ड की परीक्षा का फार्म भी भरा है और उनकी परीक्षा आज से ही शुरू हो गई है लेकिन वे परीक्षा के बजाय दीक्षा लेने जा रही हैं। शिवानी के परिवार में माता-पिता के अलावा चार बहनें और एक भाई है। तीन बहनों की शादी हो चुकी है। भाई की भी शादी हो चुकी है। दीक्षा के बाद शिवानी विरलज्योतिश्रीजी की शिष्या बनेंगीं। विरलज्योतिश्रीजी की तीन शिष्याएं पहले से हैं, शिवानी चौथी शिष्या होंगीं।

विश्वरत्न सागर की माता भी वैराग्य के राह पर
राजगढ़ निवासी कमलाबेन जैनाचार्य विश्वरत्न सागर के संसारी जीवन की मातुश्री हैं। उनकी आयु 75 वर्ष है और प्रारंभ से ही उनका जीवन जप-तप संयम से परिपूर्ण रहा है। विश्वरत्न सागर की बड़ी बहन ने भी 35 वर्ष पूर्व जैन दीक्षा स्वीकार की है और वे वर्तमान में चंद्ररत्ना श्रीजी के नाम से जानी जाती है। अब पुत्री और पुत्र के बाद मातुश्री भी संसारी जीवन छोडकऱ वैराग्य के मार्ग पर अग्रसर होने जा रही है। दीक्षा के बाद वे राजरत्ना श्रीजी की शिष्या बनेंगीं।

एक ही मंच पर तीन दीक्षा
वीआईपी मार्ग स्थित दलालबाग पर रविवार को सुबह 6 बजे से एक साथ एक मंच से तीन दीक्षाएं होंगीं। संभवत: जैन समाज इंदौर के इतिहास में यह पहला मौका है जब एक साथ तीन महिलाएं जैन साध्वी बनेंगीं। दलालबाग पर चल रहे आचार्य नवरत्न सागर मसा के 75वें जन्मोत्सव के समापन दिवस पर यह आयोजन गच्छाधिपति दौलतसागर, नंदीवर्धन सागर, जीतरत्न सागर, हर्ष सागर और विश्वरत्न सागर सहित 300 साधु-साध्वियों की निश्रा में होगा। महोत्सव संयोजक ललित सी जैन ने बताया कि तीनों बहनों के दीक्षा महोत्सव का कार्यक्रम संयोगवश नवरत्न सागर के मुख्य जन्मोत्सव के दिन हो रहा है। इस दौरान तीनों दीक्षार्थी पहले संसारी वेशभूषा में आएंगीं और उसके बाद केशलोचए वेश परिवर्तन तथा नए नामकरण की विधियां संपन्न होने के बाद उन्हें जैन साध्वी का दर्जा मिल सकेगा।

वर्षीदान का निकला वरघोड़ा
शुक्रवार को गच्छाधिपति दौलतसागर एवं सभी जैनाचार्यों की मौजूदगी में छाब की रस्म संपन्न हुई, जिसमें उन्हें साध्वी जीवन में काम आने वाली वस्तुएं सौंपी गई। शनिवार की शाम को अंतिम विदाई का कार्यक्रम भी दलालबाग में अत्यंत भावपूर्ण माहौल में संपन्न हुआ। इस अवसर पर दीक्षार्थियों का वरघोड़ा भी निकाला। जिसमें संसारी जीवन की चीजें लुटाई। जिसे लूटने के लिए समाजजनों में काफी उत्साह रहा।