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यहां कन्हैया की नहीं यशोदा मैया की होती है पूजा, धूमधाम से मनती है जन्माष्टमी

विश्व का एकमात्र यशोदा मंदिर, जहां मां यशोदा की गोदी में विराजमान है कान्हा, जन्माष्टमी के पर्व से शुरू होता है और पूरे छ: दिन तक मनता है यहां उत्सव

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इंदौर। नन्द बाबा के पुत्र और मां यशोदा के लाड़ले कृष्ण को यूं तो देश- विदेश के हजारों मंदिर मेें पूजा जाता है। कही इनके बाल स्वरूप की पूजा की जाती है तो कही गोपियों संग रास रचाते कान्हा की और कही युद्धभूमि में अर्जुन को गीता ज्ञान देने वाले युगपुरूष की। लेकिन इंदौर शहर में विश्व का एक ऐसा मंदिर है जहां कन्हैया को नहीं उनकी मैया यशोदा को पूजा जाता है। और वो भी पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ। ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में महिलाएंं मां यशोदा से अपनी गोद भरने का आर्शिवाद लेने आती है और उनकी ये मनोकामना पूरी भी होती है।

मैया की गोद में कन्हैया

इंदौर शहर के राजवाड़ा क्षेत्र में बना यशोदा माता मंदिर शायद पूरे विश्व में एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां मां यशोदा कान्हा को अपनी ममता की छाया में समेटे हुए हैं। ये मंदिर लगभग दो सौ साल पुराना है। मंदिर में यशोदा मैया की गोद में बाल रूप में श्रीकृष्ण बैठे हुए हैं। इनके अलावा नंदबाबा और राधा-कृष्ण की प्रतिमाएं भी मंदिर में विराजित हैं।

२२२ साल पहले बैलगाड़ी से लाए थे मैया की प्रतिमा
यशोदा माता रोड पर बने यशोदा मंदिर के पुजारी महेन्द्र दीक्षित बताते हैं कि उनके परदादा ने लगभग 222 साल पहले इस मंदिर की स्थापना की थी। उन्हें यशोदा माता का मंदिर बनाने की प्रेरणा उनकी माताजी ने ये कहकर दी थी कि कन्हैया को तो सारा संसार पूजता है, लेकिन उनको पालने पोसने वाली यशोदा मैया को सब भूल गए हैं। माताजी की यह बात सुन उन्होंने यशोदा मंदिर की स्थापना का संकल्प लिया था। उस समय जयपुर में मूर्ति बनवाई थी। इंदौर से बैलगाड़ी लेकर उनके परदादा जयपुर गए थे और वहां से मूर्ति लेकर आए थे।


कृष्ण जैसे पुत्र की कामना से महिलाएं करती हैं पूजन
इस मंदिर में हर गुरुवार को महिलाएं चावल, नारियल और अन्य सामान से यशोदा माता की गोद भरती हैं। ऐसी मान्यता है कि यशोदा माता की गोद भरने वाली महिलाओं की गोद मैया उन्हें कृष्ण जैसा पुत्र देकर भरती हैं। जन्माष्टमी पर भी दूर-दूर से आई महिलाएं मैया की गोद भरेंगी।

नंदबाबा से बड़ी है मां यशोदा
महेंद्र दीक्षित के अनुसार शुरू में यहां अपनी गोद में कन्हैया को खिलाते हुए यशोदा मैया की प्रतिमा थी। बाद में नंदबाबा की मूर्ति लाई गई। इसके बाद राधा-कृष्ण और फिर दाई मां की मूर्ति की स्थापना भी की गई। खास बात यह है कि यहां यशोदा माता की प्रतिमा बड़ी है और नंद बाबा की छोटी।