
इंदौर. मेरे यंग सोल्जर्स एक के बाद एक जख्मी होकर गिरते जा रहे थे, हड्डियां तक गला देने वाली सर्दी के बीच मैं उनके जख्मों पर मुट्ठी भर-भरकर केवल बर्फ लगा पा रहा था, ताकि खून का बहाव रुक जाए, क्योंकि और कोई उपाय मेरे पास नहीं था। हमने चार दिन और तीन रातों से न एक पल नींद ली थी और न ही एक बूंद पानी हमारे गले से नीचे गया था पर चल भी नहीं पा रहे थे। हमारे पास गोलियां भी कम थीं, लेकिन सबसे बड़ी चीज जो हमारे पास थी वह थी दुश्मन से लडऩे का जज्बा। उसमें कमी नहीं थी और इसी ने हमें कारगिल में जीत दिलाई।
यह कहना है 1999 के कारगिल युद्ध के नायक कर्नल ललित राय का। वे सोमवार शाम इओ यानी एंटरप्रेन्योर आर्गनाइजेशन के इंदौर चेप्टर के सदस्यों के बीच थे। उनके व्याख्यान का विषय था ‘कारगिल : लीडिंग फ्रॉम द फ्रंट’। गौर तलब है कि सेवानिवृत्त कर्नल ललित राय कारगिल यद्ध के समय गोरखा राइफल्स की फस्ट बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर थे।
उनके ही नेतृत्व में इस बटालियन ने बाटलिक सेक्टर में खालूबार हाइट्स पर फतह हासिल की थी। खालूबार हाइट्स का युद्ध में रणनीतिक महत्व था और वहां से पाकिस्तानी सेना का खदेडऩा युद्ध जीतने के लिए जरूरी था।
कर्नल राय ने कहा कि कारगिल क्षेत्र के पूरे इलाके में सबसे बड़ा दुश्मन है मौसम और वहां का भूगोल। समुद्र तल से 10 हजार मीटर ऊपर ऑक्सीजन इतनी कम हो जाती है कि सांस लेने के लिए फेफड़ों को बहुत मेहनत करना पड़ती है। फेफड़ों की हालत एेसी हो जाती है, जैसे भट्टी जल रही हो।
शरीर की हर सेल में ऑक्सीजन की कमी से कमजोर होने लगता है। फिजिकल एबिलिटी इतनी कम हो जाती है कि जहां किसी सोल्जर के लिए 100 किलो का वजन उठाना आसान होता है, वहीं यहां पर 15 किलो वजन भी भारी लगता है। एक्स्ट्रीम कोल्ड वेदर होता है, जहां तामपान माइनस 32 से माइनस 45 डिग्री से. होता है। एेसी स्थित में सैनिकों को हाइपोथर्मिया हो जाता है।
ढीले स्नो बूट्स ने बचाया
खालूबार के लिए सेना ने हमारी बटालियन के जो स्नोबूट भेजे थे, वे बहुत ढीले थे। मुझे आठ नंबर का शूज चाहिए था पर मिला 10 नंबर का। यह देखकर यंग सोल्जर नाराज हो रहे थे। मैंने कहा कि सेना जो करती है, ठीक करती है। कुछ दिन बाद दुश्मन की मशीनगन की गोली मेरे ढीले शूज में से हो कर बाहर निकल गई और मेरा पैर बच गया।
ऐसे किया विदा जैसे लौटकर नहीं आऊंगा
कर्नल राय ने बताया कि जब मैं खालूबार की जंग के लिए जा रहा था, तब मेरे अधिकारियों ने मुझे इस तरह गले लगाकर विदा किया था, जैसे मैं कभी लौटकर नहीं आऊंगा। जब मैंने खालूबार में तिरंगा फहरा दिया तो मैंने अधिकारियों को जब पहली खबर दी तो वे सब आश्चर्यचकित थे।
राइफल पर चिपक जाते हैं हाथ
हाई एल्टीट्यूट पर शरीर का एक इंच हिस्सा भी खुला रह जाए तो समस्या हो जाती है। कभी आपने देखना होगा फ्रिज में आइस ट्रे पर कभी अंगुली चिपक जाती है, ठीक वैसे ही वहां हाथ राइफल पर जम जाते हैं। राइफल से हाथ अलग करने के लिए कई बार गर्म पानी डालना पड़ता है। शरीर सुन्न होने लगता है।
नए सैनिक जब इसे सह नहीं पाते तो उन्हें तुरंत हेलीकॉप्टर से दो हजार फीट नीचे ले जाया जाता है। कभी-कभी ग्लेशियार में क्रेक्स आते हैं। अगर उनके बीच कोई गिर जाए तो आप सोच सकते हैं, क्या होता होगा क्योंकि उन क्रेक्स के बीच तापमान माइनस 75 डिग्री होता है।
सात करोड़ रुपए रोज का खर्च
कारगिल क्षेत्र के हाई एल्टीट्यूड पर सेना रखना आसान नहीं है। वहां का सेना का खर्च सात करोड़ रुपए प्रतिदिन होता है। वहां तक रसद, हथियार पहुंचाना और वहां रहने का खर्च बहुत है। पाकिस्तान की स्ट्रेटेजी यह रहती है कि जब बर्फ ज्यादा होती है तो वे कम ठंडे इलाकों में चले जाते हैं पर जैसे ही उनकी सेना ऊंचाई का इलाका खाली करती है, वैसे ही नए ट्रुप्स उनकी जगह ले लेते हैं।
Published on:
09 Oct 2018 01:44 pm
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