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हिन्दी में मुक्तिबोध का कोई उत्तराधिकारी नहीं: कवि अशोक वाजपेयी

मुक्तिबोध के अंधेरे-उजाले कार्यक्रम में दिलचस्प अंदाज में बोले ख्यात कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी  

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ashok vajpai

इंदौर. हिन्दी के प्रख्यात कवि गजानन माधव मुक्तिबोध की जन्मशती के मौके पर अभिनव रंगमंडल और रजा फाउंडेशन की ओर से शनिवार की दोपहर एक कार्यक्रम प्रीतमलाल दुआ सभागृह में आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में मुक्तिबोध के अंधेरे-उजाले विषय पर जाने-माने कवि, आलोचक, अशोक वाजपेयी ने व्याख्यान दिया। कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में लेखक-पत्रकार ओम थानवी ने वाजपेयी से कविता, कला संस्कृति आदि पर प्रश्न पूछे और कुछ सवाल श्रोताओं ने भी पूछे।

अशोक वाजपेयी ने कहा कि मुक्तिबोध का दुर्भाग्य ये नहीं है कि उन्हें कम पढ़ा गया या कम समझा गया बल्कि ये है कि हिन्दी में उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं है। एेसा उत्तराधिकारी जो उनकी तरह गहरी वेदना से अपने समय का सच लिखे। हिन्दी कविता ने ये जोखिम ही नहीं उठाया। हमने उनका नाम जाप किया। उन्हें विश्वविद्यालयों के सिलेबस में रखा, लेकिन उन्हें तिल-तिल कर हिन्दी कविता ने मारा है। हमारे साहित्य और समाज ने उनकी कविता को अप्रासंगिक बना दिया। ये कमी समाज की है मुक्तिबोध की नहीं।

अशोक वाजपेयी ने कहा कि ६० के दशक में मुक्तिबोध की मृत्यु साहित्य जगत की सबसे दारुण मृत्यु थी जिसे लेकर बहुत उद्वेलन हुआ। उनकी शवयात्रा में एमएफ हुसैन भी शामिल हुए थे। मुक्तिबोध अंधेरे के बारे में लिख कर उजाले की एक लकीर खींचते हैं। उनकी कविता एक तरह की बहस है। अपने समकालीनों से भी बहस करते हैं। उन्हें अज्ञेय का विलोम कहा जाता है, लेकिन साहित्य में कोई किसी का प्रतिलोम नहीं होता बल्कि पूरक होता है। मुक्तिबोध की ५० या ६० बरस पहले लिखी गई कविता ‘अंधेरे में’ आज के दौर की कविता लगती है। उसमें जो अंधेरा है उससे ज्यादा गाढ़ा अंधेरा आज हम महसूस कर रहे हैं। उस अंधेरे का पूर्वाभास मुक्तिबोध को था। उन्होंने अंधेरे की शिनाख्त कर ली थी।

कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने अशोक वाजपेयी से सवाल पूछे। असहिष्णुता के मुद्दे पर अवॉर्ड वापस करने वाले और सोशल एक्टिविस्ट की भूमिका मे आने के सवाल पर वाजपेयी ने कहा कि प्रतिरोध को आधुनिक चोंचला कहा गया, लेकिन मैंने अपनी नई अंग्रेजी किताब में ऋगवेद से लेकर अभी तक के उदाहरणों में बताया कि है प्रतिरोध की परंपरा तो हमारे यहां प्राचीन है।

वाजपेयी ने सवालों के जवाब में की दिलचस्प टिप्पणियां
ये युग बौनों के अभ्युदय का युग है। जो जितना बौना है उतनी ही ऊंचाई पा रहा है। महत्वपूर्ण पदों पर एेसे लोग बैठाए जा रहे हैं, जिनमें उस पद की कोई योग्यता नहीं।।
इन दिनों कविता में अभिधा का आतंक है, यानी लोग कविता को भी खबर की तरह चाहते हैं कि सब कुछ स्पष्ट हो, लेकिन कविता में व्यंजना जरूरी है।
कलाओं के प्रति अनुराग ने मुझे सरकारी नौकरी के टुच्चेन से बचाए रखा।
प्रार्थना और सपने तभी सार्थक हैं जब वो दूसरों के लिए हो।
साहित्य के बजाय ललित कलाओं में ज्यादा नवाचार हो रहा है।
हिन्दी भाषी मध्यवर्ग ही मातृभाषा से दूर हो रहा है।
असहमति को विफल होने के लिए तैयार होना चाहिए।
मैं नास्तिक इस अर्थ में हूं कि पूजा पाठ, व्रत- अनुष्ठान नहीं करता, लेकिन अध्यात्म को मनुष्य का क्रांतिकारी विचार मानता हू। मैं तो ईश्वर को भी मनुष्य का ही आविष्कार मानता हूं।