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इंदौर. भुजरिया यानी की बोने की प्रक्रिया। यह त्योहार पूरे प्रदेश में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। छलनी से छानी हुई मिट्टी, राख, गोबर का चूरा एक निश्चित अनुपात में मिलाकर एकसार किया जाता है, फिर उसे मिट्टी के बर्तन में बिछाया जाता है। उसमें गेहूं या जौ के दाने बिखेर कर शुद्ध मंजा हुआ पानी डालकर पात्र को अंधेरे में रख दिया जाता है ताकि भुजरिया सुनहरी पीली उगें नाकी हरी। इस पंरपरा के अनुसार घर में जितनी लड़कियां होंगी उतने ही भुजरिया के पात्र तैयार किए जाते हैंं। इसके बाद पूर्णिमा तक उन्हें कोई नही देख भी नहीं सकता।
जितनी अच्छी भुजरिया उतनी ही अच्छी फसल
पन्द्रह दिन बाद जब उन गमलों में गेहूं-जौ के लम्बे सुनहरे लच्छे लहलहाते हैं। कहा जाता है कि भुजरिया जितनी लम्बी और सुनहरी होतीं उतनी ही शुभ मानी जातीं हैं। साथ यह इस बात का संकेत है कि जितनी अच्छी भुजरिया उतनी ही अच्छी फसल होगी। इस दिन भुजरिया बोने वाली महिलाएं सजधज कर सुंदर कपड़े गहनों से लदकर घर से भुजरिया लेकर घर से निकलती हैं।
भुजरिया सिराने का उत्सव
सावन की पूर्णिमा के दिन दोपहर को भाइयों की कलाइयों पर राखी बांधने के बाद शाम को या अगले दिन भुजरिया मेला लगता है। जब महिलाएं भुजरिया लेकर निकलती हैं तो खब गाजे बाजे के साथ नाच गाना होता है। भुजरिया सिराने का उत्सव बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जहां भी आस पास नदी या तालाब होता है वहीं ये भुजरिया सियाई जाती है।
किन्नर का त्योहार भुजरिया
मध्यप्रदेश की राजधानी से जुड़ी एक और कहानी भी भुजरिया के लिए प्रसिद्ध है। भोपाल में बहुत साल पहले नवाबों के समय में अकाल पड़ा था। तब यहां रहने वाले किन्नरों ने मंदिरों और मस्जिदों में जाकर बारिश के लिए दुआ की थी और भुजरिया पर्व बनाया था। उनकी दुआ रंग लाई और भरपूर बारिश हुई थी। तब से लगातार भोपाल में किन्नर प्रतिवर्ष भुजरिया पर्व का आयोजन करते आ रहे हैं। यह प्रथा अब केवल भोपाल में सिमट कर नहीं रह गई है बल्कि पूरे प्रदेश में किन्नर खूब सजधज कर नाच गाना करते हुए भुजरिया को सिराने जाते हैं।
Updated on:
11 Aug 2017 04:12 pm
Published on:
11 Aug 2017 03:14 pm
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