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लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन को जिताने की विधायक रमेश मेंदोला की जिम्मेदारी

मेंदोला को बनाया संयोजक, अरविंद कवठेकर प्रभारी  

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ramesh mendola

लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन को जिताने की विधायक रमेश मेंदोला की जिम्मेदारी

इंदौर। लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन 'ताईÓ का नौंवी बार चुनाव लडऩा लगभग तय माना जा रहा है। ताई ने भी अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। इधर, पार्टी ने भी चुनाव को देखते हुए बिसात बिछाना शुरू कर दी है, जिसके चलते इंदौर में संयोजक बनाकर चुनाव की कमान विधायक रमेश मेंदोला के हाथ में दे दी है। पार्टी का मानना है कि मेंदोला जितने वोटों से चुनाव जीते उतनी लीड ताई को मिल जाएगी तो नैया यूं ही पार हो जाएगी।

2014 के लोकसभा चुनाव में ४ लाख से अधिक वोटों से ताई चुनाव जीती थी। इस बार वह भाग्य आजमाना चाहता है जिसको लेकर पार्टी की तरफ से लगभग हरी झंडी मानी जा रही है। पार्टी भी चाहती है कि ताई नौवी बार जीतकर एक नया कीर्तिमान रचे। देश की वह पहली ऐसी महिला सांसद होगी जो एक ही सीट से लगातार इतनी चुनाव जीती।

चुनाव लड़ाए जाने के पीछे की एक वजह ये भी है कि लोकसभा स्पीकर होने की वजह से सभी राजनीतिक दल के नेताओं से संबंध अच्छे है। मौका आने पर उनके जरीए लाभ लिया जा सके। ताई को चुनाव जिताने की चिंता पार्टी को भी है जिसके चलते बिसात बिछाना शुरू कर दी है। राष्ट्रीय अधिवेशन के बाद में पार्टी ने लोकसभावार प्रभारियों व संयोजकों की नियुक्तियां कर दी हैं।

इंदौर में दो नंबर से विधायक रमेश मेंदोला को संयोजक बनाया गया तो प्रभारी के तौर पर अरविंद कवठेकर को जिम्मेदारी दी गई। मेंदोला की नियुक्ति कर एक तीर से कई निशाने साधे गए हैं। प्रदेश में सबसे ज्यादा वोटों से मेंदोला चुनाव जीते थे। वे अपने बराबर वोटों की लीड भी दिला देते हैं तो ताई की स्थिति मजबूत हो जाएगी। उसके अलावा एक, तीन, पांच और राऊ में मेंदोला की पकड़ भी खासी मजबूत है। मेंदोला की प्रतिष्ठा दांव पर लगने का सीधा फायदा ताई को मिल जाएगा।

मालिनी से नहीं बैठती है पटरी
इंदौर लोकसभा की आठ विधानसभाओं में से भाजपा दो और चार नंबर विधानसभा में ही अच्छे वोटों से जीती। दोनों ही गढ़ पार्टी के मजबूत किले हो गए हैं। इसलिए लोकसभा की जिम्मेदारी यहीं से दी जाना थी। मेंदोला के अलावा दूसरा विकल्प महापौर मालिनी गौड़ का था, लेकिन उन्हें नहीं बनाया गया। उसके पीछे कई कारण हैं जिसमें से एक मालिनी का ताई से पटरी नहीं खाना भी है। उसके अलावा निगम की तोडफ़ोड़ का असर वोट बैंक पर ना पड़े इसके लिए भी गौड़ को जिम्मेदारी नहीं दी गई।

नाराजगी का उठाना पड़ा था खमियाजा
गौरतलब है कि एक दशक पहले ताई को दो नंबरी नेताओं की नाराजगी का खमियाजा भुगतना पड़ गया था। लाखों वोटों से चुनाव जीतने वाली ताई को बाउंड्री पर मात्र साढ़े ग्यारह हजार वोटों से जीत मिली थी। इस बार भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय चुनाव लडऩा चाहते हैं, हालांकि वे इस बात से इनकार कर रहे हैं। ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिए पार्टी ने खेल किया है।