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मालवा उत्सव में बिखरे आदिवासी लोक संस्कृति के रंग

भैंस के सींग से बनी पावरी और बांस की कामड़ी, मालवा उत्सव में भूले बिसरे साजों की नुमाइश

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इंदौर . संगीत और नृत्य आदिवासी और लोक संस्कृति का अटूट हिस्सा है। शहरीकरण और आधुनिकता की आंधी में कई आदिवासी और लोकवाद्य गुम हो गए। शहर के लोग तो इन्हें पहचानते भी नहीं, लेकिन ग्रामीण-आदिवासी अंचल में आज भी इनमें से लोकसंगीत की मधुर सुरधारा बहती है। एेसे भूले बिसरे साजों की एक नुमाइश मालवा उत्सव में लगाई गई है। ये सारे साज शहर के रंगकर्मी और डॉक्युमेंटरी निर्माता राजबेंद्रे के निजी संग्रह के हैं। बेंद्रे ने बताया कि ये साज उन्होंने पिछले बीस वर्षों में आदिवासी और अन्य ग्रामीण अंचलों की लगातार यात्राओं के दौरान एकत्र किए हैें।
टिमकी और कुंडी
गौंड, धूलिया और गौंड आदिवासियों का साज टिमकी कभी कमर में बांध कर तो कभी जमीन पर रख कर स्टिक से बजाया जाता है। मिट्टी की बनी टिमकी के ऊपर चमड़ा मढ़ा होता है। बैगा आदिवासी टिमकी को रंगीन फुंदनों से सजाते भी हैं। कुंडी भीलों का साज है जो मांदर के साथ बजता है।
कामड़ी और ठिसकी
कामड़ी को भील आदिवासी बांस को लंबाई में छील कर बनाते हैं। बांस के एक भाग में दांते और दूसरे भाग को खपच्ची तरह बनाकर बजाते हैं। लकड़ी की ठिसकी को बैगा जनजाति तार के जरिए ऊपर-नीचे कर बजाते हैं।

गुदुमबाजा और पावरी
गुदुमबाजा को शहडोल के आदिवासी कमर में बांध कर बजाते हैं। लोहे और लकड़ी से बना ये साज ८ से १० किलो का होता है। महाराष्ट्र की पावरी में एक ओर जंगली लौकी का खोखला भाग तो दूसरी और भैंस का सींग रहता है। ये फूंक वाद्य है। नुमाइश में बंगाल के बाउल गायकों का दुतार राजस्थान का रावण हत्था, खंजरी, डमरू, चिमटा, सहित कई और साज है जो अब कम ही देखने को मिलते हैं।
केखारी लरिका बाइ धनुष बाण धरे.....
डिंडोरी जिले के धुरखुटा गांव से आए बैगा आदिवासियों का नृत्य घोरी पठाइना दशहरे से होली तक हर मंगल अवसर पर किया जाता है। मंच पर आए कलाकारों का शृंगार देखने लायक था। पुरुषों ने सूती सफेद कपड़े का घाघरानुमा परिधान पहना था जिसे झंगा कहते हैं। उसके ऊपर सलूखा और काली बंडी। सिर पर पीला फेंटा और उस पर ऊन और मोरपंख से बनी कलगी पूरे वेशभूषा को आकर्षक बना रही थी। महिलाओं ने बिना प्लीट्स की साड़ी पर पुरुषों की तरह ही कलगी पहनी थी। महिलाआें और पुरुष दोनों के गले में सिक्कों से बना हवाल और बारीक मोतियों से बनी छिलरी नर्तकों की शोभा बढ़ा रही थी। गीत में शिकार का वर्णन था और नर्तकों के समूहों में दो नर्तकों ने मोरपंख की लंबी झाल भी पकड़ी हुई थी। मांदल और लकड़ी की ठिसकी जैसे आदिवासी वाद्य ने इस नृत्य की ध्वनियों को सबसे अलग बनाया। बैतूल की गौंड जनजाति का नृत्य थाटिया में भी नर्तकों को बांसुरी बजाते हुए नृत्य किया।

हेलो म्हारो सामलो... : राजस्थान के उदयपुर से आए लोक कलाकारों ने हेलो म्हारो सामलो रुणिजारा राजा.... गीत पर तेरह ताली नृत्य किया। महिलाएं हाथों में कोहनी के ऊपर तक चूड़े पहने हुए थीं, वहीं पुरुष राजस्थानी पगड़ी में सजे थे। तानपूरा, ढोलक और मंजीरों की धुन पर ये नृत्य भी मनोहारी था। बड़वाह से आए कलकारों ने पणिहारी नृत्य किया। कार्यक्रम के दौरान अनुभूति विजन सेवा संस्थान के दिव्यांग बच्चों ने भी दो लोकनृत्य प्रस्तुत किए।