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एवरेस्ट फतह करने वाली सुनीता बोलीं- अभी तो 14 और पहाड़ों पर करनी है चढ़ाई

दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को २०११ में फतह कर चुकी सुनीता गुर्जर मंगलवार शाम इंदौर पहुंचीं।

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इंदौर

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Amit Mandloi

Jul 25, 2018

sunita

एवरेस्ट फतह करने वाली सुनीता बोलीं- अभी तो 14 और पहाड़ों पर करनी है चढ़ाई

इंदौर. दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को 2011 में फतह कर चुकी सुनीता गुर्जर मंगलवार शाम इंदौर पहुंचीं। वे प्रकृति और पर्यावरण के लिए सोमनाथ से नेपाल तक 5000 किलोमीटर की साइकिल यात्रा पर हैं। इस मौके पर पत्रिका ने उनसे चर्चा की। सुनीता का कहना है, एवरेस्ट चढऩा ही उनकी मंजिल नहीं है। दुनिया में एवरेस्ट के बराबर 14 और चोटियों को जीतना चाहती हूं। वैसे इनमें पांच चोटियां पाकिस्तान में हैं। अगर परमिशन मिले तो उनको क्लाइंब करना चाहूंगी। उन्होंने बताया, एवरेस्ट पर पहुंचकर तिरंगा फहराया तो सबसे पहले दादी को याद किया, क्योंकि उनकी वजह से ही ये सपना दिमाग में आया था।

पता नहीं था बर्फ वाले पहाड़ भी होते हैं

हरियाणा के रेवाड़ी जिले के गूजर माजरी गांव में जन्मीं सुनीता के पिता तब बीएसएफ में सबइंस्पेक्टर थे। सुनीता ने बताया, उनकी दादी राजस्थान के अलवर में पहाडि़यों के बीच बसी एक छोटी सी ढाणी में रहती थीं। मैं बचपन में कुछ बरस उनके पास रही। तब दूसरी कक्षा में थी। पहाडि़यों के बीच बसे गांव में किसी भी काम के लिए पहाड़ी चढऩा- उतरना होती थी। दादी ने पहाड़ी चढऩा सिखाया और तभी से पहाड़ों से प्रेम मन में बस गया। उन दिनों मेरी एक सहेली अपनी फैमिली के साथ कश्मीर घूमकर आई और बताया कि पहाड़ों पर बर्फ होती है। मुझे यकीन ही नहीं आया, क्योंकि मैंने तो राजस्थान के पहाड़ ही देखे थे।

एवरेस्ट से मुश्किल था पैरेंट्स को मनाना

जब मैं नाइंथ में थी, तब नेशनल जियोग्राफिक चैनल पर मिशन एवरेस्ट प्रोग्राम देखती थी। यहीं से मैंने माउंटेनियर बनना तय किया। उत्तरकाशी के नेहरू इंस्टिट्यूट ऑफ माउंटेनियरिंग को लेटर लिखा कि मुझे ये सीखना है। जवाब आया कि १६ साल की होने पर आना। उम्र के कारण मैं थोड़ी ठहर गई। लेकिन फिर कोशिश जारी रखी। पैरेंट्स को मनाने में जुट गई, पर दोनों नहीं माने। जब कॉलेज के फस्र्ट इयर में आई तब बड़ी मुश्किल से एक महीने के बेसिक कोर्स के लिए वहां भेजा। इधर मैं बीएससी के बाद एवरेस्ट पर जाने की बात कहती तो मम्मी-पापा कहते थे, छोटी-मोटी माउंटेनियरिंग कर लो, लेकिन एवरेस्ट नहीं।

शादी के प्रपोजल ठुकराए

मैंने एमएससी फिजिकल एजुकेशन में एडमिशन ले लिया, लेकिन एक साल में छोड़ दिया। बेंगलूरु में नौकरी की, वो भी छोड़ दी। शादी के कई रिश्ते भी ठुकरा दिए, तब जाकर पैरेंट्स ने मुझे जाने की इजाजत दी। हालांकि पापा तो अभी भी चाहते हैं मैं ये सब छोड़ दूं, लेकिन ये मेरी जिद है।

स्पॉन्सर नहीं मिलते

सुनीता का कहना है, हमारे देश में माउंटेनियरिंग के लिए स्पॉन्सर नहीं मिलते। एक एवरेस्ट एक्सपीडिशन में 17-18 लाख रुपए खर्च होते हैं। इतनी रकम हमारे एक रिश्तेदार ने दी थी, जो पापा ने रिटायरमेंट से मिली राशि से चुकाई।

रोज 100 किलोमीटर साइकिलिंग

सुनीता नेपाल तक साइकिल यात्रा के लिए रोज 100 किलोमीटर साइकिलिंग करती हैं। रात को साइकिलिंग नहीं करतीं। बारिश में रेनकोट नहीं पहनतीं, क्योंकि उसकी वजह से ब्रीदिंग में परेशानी होती है। साइकिल पर चार बैग हैं, जिनमें से एक में साइकिल की किट है। पंक्चर खुद जोड़ती हैं। रोटरी क्लब से जुड़ी होने से किसी रोटेरियन परिवार में रात रुकती हैं। रेवाड़ी का रोटरी क्लब उनसे जीपीएस के जरिए जुड़ा और वे लोग रास्ते के बारे में गाइड करते हैं। इंदौर पहुंचने पर रोटरी क्लब और गुर्जर समाज ने उनका सम्मान किया।

लोगों के प्यार और मदद को नहीं भूलूंगी

महदेवी लाइब्रेरी में रोटरी क्लब और गुर्जर समाज के सम्मान समारोह में सुनीता ने कहा, मैने कन्या कुमारी से लेह तक अकेले साइक्लिंग की और अब सोमनाथ से नेपाल जा रही हूं। गांव हों या शहर हर जगह इतना प्यार मिलता है जिसे मैं कभी भूल नहीं सकूंगी। एक गांव में रात के समय एक होटल पर दूध मांगा तो खत्म हो चुका था। उन्होंने मेरे लिए बड़ी दूर से दो गिलास दूध मंगवाया और पैसे देते कहा- आप से कैसे पैसे ले सकते हैं। कई मुझे लगता है मैं पूरे देश की बेटी हूं। यात्रा में पर्यावरण के लिए पेड़ ागाने का संदेश दे रही हूं।