इंदौर। लगभग 40 साल पहले मेरी पोस्टिंग भाभरा (वर्तमान में चंद्रशेखर आजाद नगर) में थी। विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर गांव में ड्यूटी लगी। उस समय दो दिन पहले ही स्थल पर पेटी और बैलेट पेपर के साथ कर्मचारियों को पहुंचा दिया जाता था। हम तीन कर्मचारी चुनाव ड्यूटी के लिए रवाना हुए। गांव के कोटवार को स्पेशल पुलिस अधिकारी बनाकर हमारे साथ भेजा गया। गांव पहुंचकर मतदान केंद्र के पास ही के कक्ष में हम रुके। आदिवासी इलाका होने से शाम को ही पूरा क्षेत्र सुनसान हो गया।
रात को गांव में किसी की बकरी चोरी हो गई और लड़ाई-झगड़ा भी शुरू हो गया। भीड़ स्कूल की तरफ बढ़ी। इसमें हमारा स्पेशल पुलिस अधिकारी बना कोटवार सबसे आगे नजर आया। वह नशे में था और कुछ बोले बगैर ही तीर कमान हमारे ऊपर तान दिए। हमने घबराकर बैलेट पेपर व पेटी सुरक्षित करने के लिए कमरा बंद कर लिया। कुछ देर के बाद वे लोग चले गए। उस समय हमारे पास पुलिस या अधिकारियों से संपर्क करने के लिए कोई साधन नहीं था। रात लगभग 1 बजे झोनल अधिकारी आए तब उन्हें पूरी घटना बताई। वे कोटवार को अपने साथ ले गए और रात 3 बजे पुलिस भेजी। इसके बाद सुबह हमने शांतिपूर्ण तरीके से मतदान कराया। यह अनुभव रिटायर्ड कर्मचारी नंदकिशोर उपाध्याय (76 वर्षीय) ने सुनाए।
हर चुनाव में शासकीय कर्मचारी अहम भूमिका निभाते हैं। चुनाव के दौरान आने वाली परेशानियों को दूर कर कर्मचारी शांतिपूर्ण मतदान कराने में पूरा सहयोग करते हैं। चाहे ट्रेनिंग हो या दुर्गम क्षेत्रों में मतदान के लिए पहुंचना। सभी कामों को कर्मचारी पूरा करते हैं। चुनावों को लेकर पेंशनर्स एसोसिएशन इंदौर के सदस्यों ने अपने अनुभव साझा किए। प्रांताध्यक्ष श्याम जोशी ने सभी से मतदान की अपील भी की।
फर्जी वोटर को पकड़कर लगाई थी फटकार
रिटायर्ड लेबर इंस्पेक्टर बाबूलाल शर्मा (79 वर्षीय) ने बताया, इंदौर के सुभाष नगर में ड्यूटी लगी थी। एक व्यक्ति वोट डालने के बाद दोबारा किसी अन्य के नाम की पर्ची लेकर पहुंच गया। शक होने पर उसे वोट डालने से रोका। इस पर वह विवाद करने लगा और वोट डालने की जिद पकड़ ली। मैंने उसे बुलाया और पड़ताल की। पुलिस को बुलाकर उसका वेरिफिकेशन कराने को कहा। इतना सुनने ही वह वहां से भाग गया। उसके बाद और सतर्कता से मतदाताओं की पहचान की गई।
भोजन ले जाते थे साथ
श्रम विभाग से रिटायर्ड कर्मचारी त्रिलोकचंद परमार (77 वर्षीय) ने बताया, उस समय हम अपने साथ एक दिन का भोजन और दूसरे दिन के लिए मिक्चर या अन्य सामग्री रखकर ले जाते थे। गांव में भी कोटवार व शिक्षक भोजन की पूरी व्यवस्था करते थे। आज भी लगभग ऐसा ही माहौल है। एक बार चुनाव के दौरान एक बुजुर्ग महिला बहकावे में आकर दोबारा वोट डालने पहुंच गई। उसे किसी ने बताया कि दो बार वोट देना है। चुनाव प्रक्रिया समझाने पर वह वापस लौट गई।
दो दिनों की होती थी ट्रेनिंग
रिटायर्ड हेड मास्टर जगदीश शर्मा (69 वर्षीय) ने बताया पहले बैलेट पेपर से चुनाव होते थे। दो दिन की ट्रेनिंग होती थी। इसके बाद मतदान केंद्र पर भेज दिया जाता था। अब इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन होने से ट्रेनिंग का समय बढ़ गया है, वहीं मतदान का पूरा तरीका भी कर्मचारियों को बताया जाता है। गांव में जाने के लिए बसों के बजाय ट्रेक्टर होते थे, वहीं बैलेट पेपर व पेटी लेकर कई टीमों को पैदल भी जाना पड़ता था। अब हर जगह रास्ते बनने से आवागमन की आसानी होती है।