
नीति आयोग एक संस्थान है, आयोग क्यों नाम दिया जा रहा है?-मुरलीमनोहर जोशी
इंदौर. पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने सरकार द्वारा बनाए गए नीति आयोग पर सवाल उठाते हुए कहा, इसे आयोग नाम क्यों दिया गया? इसका पूरा नाम नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टांसफार्मिंग इंडिया है। स्पष्ट है, यह एक इंस्टीट्यूट है, इसके आगे आयोग जोड़ कर सरकार क्या कहना चाह रही है, स्पष्ट नहीं है। इसके बारे में किसी को कुछ पता भी नहीं है। क्या काम कर रहा है, क्या नीतियां बन रही है।
अभ्यास मंडल की व्याख्यानमाल के समापन अवसर पर इंदौर आए जोशी पत्रिका से अनौपचारिक चर्चा कर रहे थे। उन्होंने कहा, वर्तमान में अच्छी शिक्षा, अच्छी चिकित्सा पैसे वालों तक सीमित रह गई है। गरीब और आम आदमी के लिए योजनाएं कहां बन रही है? इसको ले कर स्पष्टता नहीं है। जब पत्रिका ने मोदी सरकार के कामकाज को ले कर पूछा और १० में से नंबर देने को कहा तो उन्होंने जवाब दिया, परीक्षा में कागज पर जब कुछ लिखा हो तो परीक्षक नंबर देता है। कितने नंबर दूं अब आप ही सोच लें।
देश में चुनावों पर उन्होंने कहा, मनमोहनसिंह के समय भी यही होता रहा। चुनाव ही होते रहें। पूरे साल चुनाव होते, फिर परिणाम आते थे। वर्तमान में राजनेताओं ने दो विकल्प दे दिए हैं। सारा प्रयास राजनीति को निर्विकल्प करने की ओर है। यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है। वोट डाल कर ही जनतंत्र को बचाया जा सकता है। राष्ट्रपे्रम का लोकलाईजेशन हो गया है। शिक्षा पर चिंता जताते हुए कहा, प्रायवेट लोग और सरकार दोनों ही इसे विकसित नहीं कर रहे हैं। यूजीसी यदि पैसा नहीं
दे रही है तो पूछना चाहिए, इतना पैसा कहां जा रहा है।
ग्लोबलाइजेशन में हो रहा भारत का दोहन, अपने हित साधने में लगे दुनिया के देश
इससे पहले जाल सभागृह में आयोजित व्याख्यानमाला समापन समारोह में जोशी ने कहा, दुनिया को एक बाजार बनाने और विकसित करने के लिए किया गया ग्लोबलाइजेशन का सिद्धांत अपने मूल रास्ते से भटक गया है। दुनिया के देशों ने इससे एक बाजार तो बना लिया, लेकिन इसका उपयोग कुछ ही देश अपने हित साधने के लिए कर रहे हैं। भारत इस दौड़ में पिछड़ गया है, अमरीका, चीन, जापान, कोरिया जैसे देश भारत का दोहन कर रहे हैैं। हमें अभी भी इसे समझने की जरूरत है, स्वदेशी उत्पादों को बलाए ताक रखने की प्रवृत्ति पर अकुंश लगाना होगा।
वे ‘ग्लोबलाइजेशन की चुनौतियां और समाधान’ विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने ग्लोबलाइजेशन के वर्तमान और भविष्य को समझाते हुए लोगों को चेतावनी दी, उपभोग की फैशन को अपनाने से पहले अगली पीढ़ी का थोड़ा सा ख्याल कर लें। दुनिया ने इस सिद्धांत के आधार पर मार्केट की थ्योरी विकसित कर उपभोगवाद को चरम पर लाकर खड़ा कर दिया है। आज दुनिया की बड़ी कंपनियों का ध्यान उत्पादन और खपत पर है। दोनों पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं किया जा रहा है। एक्सोनेशियल ग्रोथ का कांसेप्ट दुनिया अपना रही है। इससे ग्लोबलाइजेशन विकास के लिए अब समस्या बनता जा रहा है। उन्होंने कहा कि नर्मदा, गंगा, कावेरी से जल के अतिदोहन के परिणाम हैं आपके सामने हैं और तीनों नदियां प्रदूषण के साथ ही पानी की कमी से कई स्थानों पर सूख रही हैं।प्रकृति का अति दोहन करने में जुटे
जोशी ने कहा, आवश्यकता का विस्तार लगातार होने से उपभोग बढ़ रहा है। मल्टीनेशनल कंपनियां अपना उत्पादन बढ़ा रही हैं, इसकी खपत के लिए मार्केटिंग करती हैं, अधिकाधिक उपभोग के लिए प्रेरित कर रही हैं। इसका असर प्राकृतिक संसाधनों पर हो रहा है। दादा अपने बेटे से पोते की अपेक्षा कर रहे हैं, लेकिन पोते के लिए बचाने की पहल नहीं करते हैं। हम प्रकृति का अति दोहन करने में जुट गए हैं। एक दूधपीता बच्चा जब तक मां का दूध पीता रहे तो मां स्वस्थ्य रहती है। जब वह दूध के बाद आने वाला खून पीने लग जाएगा तो मां की सेहत की कल्पना आप सभी कर सकते हैं।
Published on:
20 May 2018 08:22 pm
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