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विश्व जल दिवस… वाटर रीसाइकिलिंग से ही भविष्य में होगा संरक्षण

तेजी से बढ़ रही जनसंख्या के दौर में पानी की मांग 1 फीसदी की दर से बढ़ रही हैं

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इंदौर. तेजी से बढ़ रही जनसंख्या के दौर में पानी की मांग 1 फीसदी की दर से बढ़ रही हैं। जल स्रोत सिकुड़ रहे हैं। जल विश्लेषकों की माने तो भविष्य में मांग और बढ़ेगी, ऐसे में जल संरक्षण और प्रबंधन एक चुनौती बन रहा है। खास कर पानी के पुर्नउपयोग (रीसाइकलिंग) में अनेक चुनौतियां है, जबकि भविष्य में यही जल संरक्षण का सबसे कारगर तरीका होगा।

वर्तमान दौर में बारिश के पानी को सहेजने के लिए नदियों पर बांध बना रहे हैं, तालाबों का निर्माण किया जा रहा है। लेकिन, उपयोग के बाद व्यर्थ बह रहे पानी की केयर हम नहीं कर रहे हैं। आज 70 फीसदी पानी का उपयोग खेती में और 30 फीसदी से पेयजल व उद्योगों की आपूर्ति हो रही है। मालवा पठारी इलाका होने से यहां पानी के बड़े स्रोत नहीं है। पेयजल ही नहीं, व्यावसायिक उपयोग का जल भी 550 मीटर नीचे नर्मदा से ला रहे हैं। एेसे में हमारे लिए पानी का पुनर्चक्रीकरण और पुनरुपयोग भविष्य के लिए बड़ा एजेंडा होगा। अपशिष्ट जल सिर्फ पर्यावरण को ही खराब नहीं कर रहा है, बल्कि हमारे साफ जल को भी प्रदूषित कर रहा है। महानगरों में पानी के पुनर्चक्रीकरण के ग्रे ( बाथरूम-किचन का पानी) और ब्लैक (ड्रेनेज) के पानी को अलग-अलग किया जा रहा है। इंडस्ट्रीयल उपयोग के पानी को अलग उपचारित कर रहे हैं।

शहर में आज भी अपशिष्ट जल नालों में बह रहा है। पुनर्चक्रीकरण करने वाले संस्थानों की संख्या शहर में १० भी नहीं है। हम 60 से 70 फीसदी पानी को उपचारित करने का दावा कर रहे हैं, लेकिन दोबारा उपयोग १० फीसदी भी नहीं हो रहा है। हमारे कॉलेज में बने प्लांट का ६० फीसदी पानी हम हरियाली के लिए उपयोग में लाते हैं।

मालवा में पानी की सीमित उपलब्धता वाले हमारे शहर को केंद्रीयकृत पुनर्चक्रीकरण नहीं, छोटे-छोटे पुनर्चक्रण प्लांट की जरूरत है। इस कार्य को कोई सरकारी एजेंसी नहीं, लोगों को स्वप्रेरणा से करना होगा। व्यवस्था और प्रबंधन जरूर प्रशासन-नगर निगम की जिम्मेदारी होना चाहिए।
प्रो संदीप नारूलकर, जीएसआईटीएस