
साईं समाधि शताब्दी दिवस पर सभी धर्मगुरू हुए शामिल (फोटो)
इंदौर. साधु संतों का काम ही होता है, समाज को नई दृष्टि देना। साईं ने भी भक्त की दृष्टि लाकर समाज को नई दिशा प्रदान की। भगवान को आंखों से नहीं दिल की आंखों से देखना चाहिए। उक्त विचार साईं कथा वाचक शुभ्रम बहल ने एरोड्रम रोड स्थित दलालबाग में आयोजित सात दिवसीय साईं भागवत कथा के चौथे दिन सोमवार को साईं समाधि शताब्दी दिवस के 100 वर्ष पूर्ण होने पर सभी भक्तों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने बताया, शिर्डी के साईंनाथ ने सौ वर्ष पूर्व 15 अक्टूबर 1918 में दोपहर 2.30 बजे अपने नश्वर शरीर का त्याग करते हुए महा समाधि ली थी। आज 15 अक्टूबर 2018 के दिन श्री साईं की समाधि को 100 वर्ष पूर्ण हो गए हैं। बाबा का वचन है- मुझे सदा जीवित ही जानो, अनुभव करो सत्य पहचानो। अर्थात आज भी जब कोई भक्त श्रद्धा-भक्ति से उन्हें पुकारता है तो साईंनाथ ततक्षण प्रकट हो जाते हैं। श्री केंद्रीय साईं सेवा समिति धार्मिक एवं मानव सेवा ट्रस्ट के गौतम पाठक, हेमंत मित्तल व समीर जोशी ने बताया, दलालबाग में सोमवार को साईं शताब्दी समाधि महोत्सव के 100 वर्ष पूर्ण होने का जश्न भी मनाया गया। इस अवसर पर सभी धर्म गुरुओं ने शामिल होकर सर्वधर्म समभाव का संदेश भी दिया। साईं भागवत में डॉ. इशरत अली (शहरकाजी), रामचन्द्र अमृतफले महाराज, फादर वर्गीस, दलजीतसिंह (इमली सहाब गुरूद्वारा) सहित अन्य समाजों के पदाधिकारी ने भी शामिल होकर साईं भागवत कथा का श्रवण किया। साईं भागवत कथा के दौरान सभी धर्मों के धर्म गुरुओं ने सर्वधर्म समभाव का संदेश भी साईं भक्तों को दिया।
इंसान की फितरत में शामिल है कि वे आपस में झगड़ लेते हैं। यह तो भगवान की कृपा है कि उन्होंने से बाबा के रूप में हमें यह बताने वाला स्वरूप दिया कि सबका मालिक एक है। इसी तहजीब को हम आगे भी बनाए रखे यही कामना। उक्त विचार
शहर काजी डॉ. इशरत अली, फादर वर्गीस, दलजीत सिंह और रामचंद्र अमृतफले महाराज ने व्यक्त किए। वे दलालबग में आयोजित साईं भगवत कथा के दौरान बोल रहे थे।
Published on:
16 Oct 2018 04:16 am
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