
पुराने कपड़ों का शोरूम, यहां मिलती हैं खुशियां
इंदौर.
दीपावली पर हम नए कपड़े, मिठाइयां और पटाखे खरीदते हैं लेकिन समाज में एक बड़ा तबका ऐसा भी है जो कभी रोशनी के इस पर्व पर न तो नए कपड़े पहन पाता है और न ही कभी मिठाइयां खा पाता है। इसी बात को ध्यान में रखकर हमने निर्णय लिया कि नए कपड़े लाकर देना तो बस की बात नहीं है लेकिन नए जैसे कपड़े लाकर तो इन लोगों को दिए ही जा सकते हैं। यह सोचकर शहर की कई पॉश कॉलोनी में जाना शुरू किया और लोगों से ऐसे कपड़े देने की अपील की जो अच्छी कंडीशन में हैं और उनके काम नहीं आ रहे हैं।
यह कहना है सुजान चोपड़ा का जो मणिधारी मंडल के समन्वयक हैं और समाजसेवा के क्षेत्र में अपने नए प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं। सुजान बताते हैं कि अब इन कपड़ों के लिए हमने हवा बंगला स्थित नारी निकेतन में एक शोरूम खोल लिया है। इसमें 10 हजार से अधिक कपड़ों का कलेक्शन है। श्वेतांबर जैन समाज द्वारा खुले इस शोरूम को मुख्य उद्देश्य है हर स्तर पर गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा करना।
पुराने कपड़े धुलकर प्रेस होते हैं, फिर शोरूम में सजते हैं
संस्था द्वारा इस शोरूम पर बच्चों, बुजुर्गों और नवजात शिशुओं के कपड़े भी लिए जाते हैं। महीने में एक बार घर-घर से संस्था की गाड़ी कपड़े इक_ा करती है और कपड़ों को धोने के बाद प्रेस किया जाता है। इसके बाद इन कपड़ों की पैकेजिंग करते हैं जिन्हें बच्चे, महिला, पुरुष और बुजुर्गों को साइज के हिसाब से दिया जाता है। चोपड़ा के मुताबिक, गरीब लोग शोरूम में आकर मुफ्त में कपड़े ले जाते हैं। हम एक बार में एक व्यक्ति को दो जोड़ कपड़े ही देते हैं। जो लोग रुपए दे सकते हैं उनसे हम 10, 20 और 50 रुपए प्रति जोड़ी लेते हैं और इस पैसे से दिवाली पर बच्चों के लिए मिठाइयां खरीद लेते हैं।
सालभर में बांटे 10 हजार कपड़े
चोपड़ा ने बताया कि कभी-कभी कुछ कपड़े फटे हुए आ जाते हैं तो हम उन्हें बाहर कर देते हैं। उन्हें हम शोरूम पर नहीं रखते। ऐसे कपड़ों को हम मंदिरों में जाकर दे देते हैं ताकि वे किसी भी उपयोग में ले सकें। अब तक संस्था द्वारा एक साल में दस हजार कपड़े गांव-गांव तक बांटे जा चुके हैं। इसमें आंगनबाड़ी, स्कूलों और फैक्ट्रियों के मजदूरों को भी कपड़े दिए गए हैं।
संस्था 20 साल से घर-घर जाकर गाड़ी से रद्दी और अन्य अनुपयोगी सामान ले रही है। रद्दी बेचकर वृद्धाश्रम के जरूरतमंदों के लिए उपयोगी सामान लिया जाता है। पुस्तकें भी खरीदी जाती हैं जो लोगों को मुफ्त में पढऩे को दी जाती हैं।
Published on:
21 Oct 2018 04:16 am
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