कुछ साल पहले तक उत्तरभारत में अभिभावक बच्चों को केवल कथक ही सिखाना चाहते थे, लेकिन अब माहौल बदल रहा है। उत्तर के शहरों में दक्षिण के नृत्य लोकप्रिय हो रहे हैं। लखनऊ हो या बनारस सभी जगह भरतनाट्यम के साथ कुचिपुड़ी, मोहिनी अट्टम तक सीखे जा रहे हैं।
ये बात भरतनाट्यम नृत्यांग्ना और आईआईटी बीएचयू की डांस इंस्ट्रक्टर अनन्या त्रिपाठी ने पत्रिका से विशेष चर्चा में कही। वे मंगलवार को वरदा नृत्य संस्था में भरतनाट्यम के मेकअप की वर्कशॉप लेने आई थीं।
भरतनाट्यम के लिए सीखी तमिल
अनन्या ने कहा कि उन्हें भरतनाट््यम में पारंगत होने का इतना जुनून था कि उन्होंनें तमिल- तेलुगू का डिप्लोमा किया और कर्नाटक म्यूजिक भी सीखा। वे मानती हैं कि नृत्य में तब तक भाव नहीं आएंगे जब तक नृत्ययांगना को उस रचना के भाव पता न हों। मेरे गुरु कहते थे रचना का रस पियो तब नृत्य करो।
बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी का बड़ा योगदान
अनन्या त्रिपाठी ने बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट से डांस में बैचलर और भरतनाट््यम में पीजी डिग्री ली है। उनका कहना है कि इस डिपार्टमेंट के एचओडी डॉ. पे्रमचंद होम्बल और अन्य फैकल्टी ने भरतनाट्यम को उत्तर भारत में लोकप्रिय बनाने में बड़ा योगदान दिया है। डॉ. होम्बल ने भरतनाट््यम में प्रयोग होने वाली तमिल रचनाओं का हिन्दी अनुवाद किया है। भरतनाट्यम के वरणम के लिए कई हिन्दी रचनाएं लिखी हैं। इनमें गंगा वरणम प्रमुख है। दरअसल भरतनाट्यम के कम लोकप्रिय होने का प्रमुख कारण भाषा है, क्योंकि समझ में नहीं आने से लोग उस नृत्य से जुड़ नहीं पाते।