12 जनवरी 2026,

सोमवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

तराणेकर पंचविंशति स्मृति महोत्सव बोलीं ताई-त्रिपदी परिवार के जनक थे तराणेकर

राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हस्तियों ने किया सम्मान

2 min read
Google source verification
Taranakar

इंदौर. अभय प्रशाल में नाना महाराज तराणेकर पंचविंशति स्मृति महोत्सव में सोमवार को दिनभर दिगंबरा दिगंबरा मंत्र गूंजे। सुबह सामूहिक नाना महाराज श्री राजा उपचार पूजा, मार्तंड सप्तशती के सामूहिक परायण, यति पूजन व संतों के संस्कार के कार्यक्रम हुए।

शाम को लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, शंकराचार्य सच्चिदानंद नरसिंह भारती, संकेश्वर कर्नाटक एवं संस्थान प्रमुख डॉ. प्रदीप उतारने कर बाबा साहेब एवं महापौर मालिनी गौड़ की उपस्थिति में राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त हस्तियों का सम्मान किया गया। सभी ने डॉ. मनीषा पाठक रायपुर , अमृतेश औरंगाबाद, डॉ. मीनल सांगोळे आदि का श्रीफल एवं प्रतीक चिह्न देकर सम्मान किया। इस मौके पर लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा कि नाना महाराज त्रिपदी के जनक थे, केवल उत्तर भारत में ही नहीं दक्षिण भारत में भी आज भी नाना तराणेकर को श्रद्धा से याद किया जाता है।

मेरा आत्मविश्वास बढ़ता है
महाजन ने कहा, नाना ने 100 वर्ष पूर्व दिगंबरा, दिगंबरा के साथ प्रतिपादित शुरू की थी, वह आज देश के 8 राज्यों में फैल गई है। जब भी नाना से मिली या अवतार लेकर संस्थान जाती हूं तो मुझे अलग ही अनुभूति होती है और मेरा आत्मविश्वास बढ़ता है। मालिनी गौड़ ने कहा कि नाना तराणेकर विराट व्यक्तित्व था। अतिथियों ने अ ग्रेट सोनी नाना महाराज ब्लिस फुल कैरेक्टर पुस्तक का विमोचन किया। पं. वंशी कृष्ण धन पार्टी अवधूत ने भी विचार रखे।

‘मंथरा के होने पर राम को भी जाना पड़ा वनवास’
यदि हमारे घर में मंथरा जैसी दासी हो या आसपास ऐसे लोग हों, जिनके मन में बहुत लोभ हो और वे केवल अपना ही स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हों तो वे लोग भगवान राम जैसे आदर्श और संस्कारों पर चलने वाले मनुष्य को भी वनवास भोगने पर विवश कर देते हैं। यह विचार एमआर-9 कारस देव नगर स्थित मंशापूर्ण हनुमानमंदिर में चल रही 9 दिनी श्रीराम कथा में सोमवार को कथावाचक पं. संजीव मिश्रा ने वनवास प्रसंग की व्याख्या करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा, भगवान राम वन में जाकर भी भारतीय संस्कृति का पालन करते हुए संतों को सम्मान देते हैं, संस्कारों को समृद्ध करते हैं। उनको वनवासियों से अपेक्षा से कई गुना अधिक सम्मान प्राप्त हुई।