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टीडीआर पॉलिसी का प्रारूप जारी

- स्मार्ट सिटी क्षेत्र के लोगों को मिलेगा बड़ा फायदा- पॉलिसी जारी होने के पहले तोड़े मकानों को भी पॉलिसी में किया शामिल

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इंदौर.
राज्य सरकार ने लंबे समय से अटकी ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट (टीडीआर) पॉलिसी का आखिरकार प्रारूप सोमवार को जारी कर दिया। सरकार ने प्रारूप पर एक महीने में दावे आपत्ति बुलाए हैं। इन दावे आपत्ति के निराकरण के बाद इसके अंतिम रूप को प्रकाशित किया जाएगा।
इस पॉलिसी के लागू होने के बाद शहर में विकास योजनाओं के लिए जिन लोगों के मकान लिए गए हैं, उन्हें सबसे ज्यादा फायदा मिलेगा। ऐसे लोग जिनके मकान का काफी हिस्सा चला गया है, और थोड़ा सा हिस्सा ही बचा है, और उसमें विकास की अनुमति नगरनिगम से नहीं मिल पा रही है, उन लोगों को इसके कारण उनकी जमीन का मुआवजा मिल सकेगा और वे टीडीआर के रूप में मिलने वाले प्रमाण पत्र के तौर पर मिलने वाली जगह का सौदा कर सकेंगे।
स्मार्ट सिटी क्षेत्रों को होगा सबसे ज्यादा फायदा
इसका सबसे ज्यादा फायदा स्मार्ट सिटी में रहने वाले लोगों को मिलेगा। इन इलाकों में जिन जमीन और मकान मालिकों के मकान टूटे हैं, उन्हें मुआवजे के तौर पर नियमों के तहत नगर निगम निर्माण के लिए टीडीआर का सर्टिफिकेट जारी किया जाएगा। इसके तहत स्मार्ट सिटी की सड़कों महूनाका से टोरी कॉर्नर, गंगवाल से मच्छीबाजार, बड़ा गणपति से राजमोहल्ला चौराहा, सुभाष मार्ग आदि में जो तोडफ़ोड़ नगर निगम ने की है, वहां के मकान मालिकों को भी इसका फायदा मिलेगा।
स्मार्ट सिटी के लिए जुट पाएगा पैसा
नगर निगम ने केंद्र सरकार को इंदौर में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत ५९०० करोड़ के कामों के प्रस्ताव भेजे थे। इसमें से 1000 करोड़ केंद्र और राज्य सरकार से मिलने थे, बाकी की व्यवस्था निगम को करनी थी, निगम ने पैसा जुटाने के लिए जो आर्थिक ढांचा भेजा था, उसमें टीडीआर के जरिए सबसे ज्यादा लगभग २५०० करोड़ से भी ज्यादा की रकम आने की उम्मीद जताई थी। लेकिन पॉलिसी तय नहीं होने के कारण स्मार्ट सिटी के लिए आवश्यक ये राशि नहीं जुटाई जा सकी थी। अब इसका रास्ता साफ हो पाएगा।
ये है टीडीआर
ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट (टीडीआर) का मतलब है कि विकास योजना के लिए जो जमीन ली गई है, उसके अनुपात में सरकार की ओर से एक प्रमाण पत्र जारी किया जाएगा। जिसमें उसको वास्तविक जमीन तो नहीं लेकिन कागजों में जमीन का मालिकाना हक प्राप्त रहेगा। जिसकी सरकारी तौर पर खरीद-फरोख्त भी की जा सकेगी।
महापौर लगातार कर रही थी प्रयास
टीडीआर पॉलिसी लागू नहीं होने के कारण सबसे ज्यादा प्रभावित इंदौर हो रहा था। महापौर की विधानसभा में आने वाले क्षेत्रों में ही स्मार्ट सिटी के कारण सबसे ज्यादा तोडफ़ोड़ हुई थी। वो लगातार मुख्यमंत्री से इसके लिए मुलाकात करने के साथ ही इसे जल्द से जल्द लागू करवाने के लिए निवेदन करती रही हैं। इस पॉलिसी को लागू कराने के लिए उन्होने विधानसभा सत्र के दौरान भी मुख्यमंत्री को कहा था।
पॉलिसी के प्रारूप के मुख्य बिंदू
- विकास कामों के लिए ली गई जमीनों के एवज में टीडीआर दिया जा सकेगा। इसमें पॉलिसी लागू होने के पूर्व में ली गई जमीनें भी शामिल हैं। हालांकि इसमें शर्त रखी गई है कि इसके एवज में किसी तरह की क्षतिपूर्ति या भूगतान संबंधित को नहीं किया गया हो।
- जिन सड़कों को नए सिरे से विकसित किया गया है उनके दोनो ओर 150-150 मीटर का क्षेत्र प्रभावित क्षेत्र माना जाएगा।
- कोई व्यक्ति यदि बची जमीन पर निर्माण करना चाहता है और उसके निर्माण के लिए आवश्यक जमीन कम है तो वो टीडीआर की खरीद करते हुए उसको पूरा कर सकेगा। हालांकि जो टीडीआर वो खरीदेगा उसका 50 फिसदी उसे नगर निगम या संबंधित प्राधिकरण से खरीदना होगा, बचा हुआ हिस्सा वो दूसरे से ले सकेगा।
- प्रभावित क्षेत्र में यदि कोई व्यक्ति मकान खरीदकर कुछ बनाना चाहता है उसके टीडीआर खरीदने के लिए सरकार ने सूत्र बनाया है, इसके हिसाब से ही उसे टीडीआर खरीदने की पात्रता रहेगी।
- नगर निगम सीधे किसी भी क्षेत्र को प्रभावित क्षेत्र के तौर पर घोषित नहीं कर सकेगी। उसके लिए वो क्षेत्र को चिन्हित कर उसे पहले संचालक टीएंडसीपी को भेजेगी, वो इस पर अपनी रिपोर्ट तैयार कर उसे सरकार के पास भेजेंगे। सरकार इसके बाद क्षेत्र को प्रभावित क्षेत्र तय करेगी।
- प्रभावित क्षेत्र में एफएआर की गणना भी अलग-अलग होगी। इसके लिए भी प्रभावित क्षेत्र के प्रस्ताव बनाकर संबंधित एजेंसी संचालक टीएंडसीपी को भेजेगी। वहां से इस पर रिपोर्ट बनाकर सरकार के पास भेजा जाएगा और सरकार वहां के एफएआर के रेशो को तय करेगा, हालांकि ये रेशो दो से कम का नहीं होगा।
- जिस क्षेत्र में योजना लागू होगी वहां के जमीन के दामों को तय करने के लिए भी एक निश्चित फार्मूला सरकार द्वारा तय किया गया है।
- यदि सड़क में ली गई जमीन के बाद बचा हुआ हिस्सा निर्माण योग्य नहीं रह जाता है तो उस जमीन को भी अधिग्रहित किया जा सकेगा, हालांकि इसका उपयोग सड़क से जुड़े कामों में ही किया जा सकेगा।
- टीडीआर रखने वाला व्यक्ति यदि इसमें से कुछ हिस्सा किसी को बेचना चाहता है तो वो बेच तो सकेगा, लेकिन उसके बाद उसे दूसरा सर्टिफिकेट जारी करवाना होगा।
- टीडीआर सर्टिफिकेट किसी व्यक्ति, पंजीकृत सोसायटी या कंपनी के नाम पर हीजारी हो पाएगा। भागीदारी फर्म, नामांकित व्यक्ति, अभिकर्ताओं के नाम पर टीडीआर सर्टिफिकेट जारी नहीं होगा। हालांकि भागीदारी फर्म के लिए प्रावधान किया गया है कि फर्म के सभी भागीदारों या फिर फर्म के भागीदारों द्वारा नामांकित व्यक्ति के नाम पर ही ये सर्टिफिकेट जारी होगा।
- डीटीआर सर्टिफिकेट पांच साल के लिए ही जारी होगा। यदि पांच सालों में इसका उपयोग नहीं किया गया तो ये खत्म हो जाएगा, हालांकि इसे एक बार पांच साल के लिए बढ़ाने की छूट नियमों में दी गई है।
- टीएंडसीपी संचालक को अधिकार रहेंगे कि वो समय-समय पर टीडीआर के संबंध में निर्णय ले सकेंगे। टीडीआर की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाने के साथ ही वे खरीदार को सर्टिफिकेट जारी करना है या नहीं इस पर अंकुश लगा सकेंगे।
0 इस पॉलिसी के लागू होने के बाद शहर में विकास कामों को प्रभावित होने वालों को मुआवजे के रूप में एक अधिकार मिल पाएगा। वे टीडीआर सर्टिफिकेट के जरिए अपनी जमीन के बदले पैसा पाने के अधिकारी हो जाएंगे। इस पॉलिसी के प्रारूप के प्रकाशन के बाद हम जल्द से जल्द इसे लागू करवाने की कोशिश करेंगे।
- मालिनी गौड़, महापौर