संदीप पारे @ परांजपे कहते हैं कर्तव्य को निष्ठा के साथ पूरा करो। विद्यार्थियों के लिए पहला पाठ समय का महत्व, अनुशासन व विनम्रता हो। शिक्षक में हमेशा कुछ नया देने की चेष्टा होनी चाहिए। हमें अच्छे शिक्षक तैयार करने होंगे हमारे 'भविष्य' के लिए।
विद्या विनयेन शोभते यानी विनय विद्या को शोभायमान करता है। इसका जीवंत उदाहरण हैं इंदौर के माधव गणेश परांजपे। सौम्य मुस्कान, विनयशीलता और विरले व्यक्तित्व के धनी परांजपे 86 वर्ष की उम्र में भी ऊर्जावान युवा के रूप में ही काम करते हैं। जीवन मूल्यों को शिक्षा के साथ जोड़कर पढ़ाने में इंदौर को एक अलग पहचान दिलाने वाले परांजपे वर्तमान में सत्यसाईं विद्या विहार के निदेशक हैं। डेली कॉलेज से शिक्षक कार्य की शुरुआत की, वैष्णव स्कूल में प्राचार्य रहे। गुजरात के वापी में भी प्राचार्य बने। वर्ष 1987 में सत्यसाईं स्कूल से जुड़े।

परांजपे ने शिक्षा के साथ सृजनता को जोडऩे कर बच्चों की प्रतिभा को निखारने का काम बखूबी किया। बच्चों का अखबार उन्होंने निकाला। काफी दिनों तक चलाया भी, लेकिन विज्ञापन और अनुदान नहीं मिलने पर बंद भी कर दिया। परिवार से प्रेरणा लेकर शिक्षण कार्य में आने का मन बना लिया था। अपना जीवन बच्चों को संस्कार और सेवा के संवाद से जोडऩे में लगाया। कहते हैं- शिक्षा तब तक पूरी नहीं होगी, जब तक आप एक विद्यार्थी को जीवन मूल्यों और उसकी सृजनशीलता से अवगत नहीं कराएंगे। उन्होंने हमेशा इन दोनों को शिक्षा नीति का आवश्यक हिस्सा बनाने की सिफारिश भी की।