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900 डिग्री पर 8 घंटे पकने पर बनता है टेराकोटा क्ले आर्टिकल

कलांजलि आर्ट एकेडमी में टेराकोटा वर्कशॉप, हैंडमैड टेक्निक से सीखेंगे आर्टिकल बनाना

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Terracotta workshop

इंदौर. दुनिया की सबसे पुरानी आर्ट है टेराकोटा। टेराकोटा का इटालियन भाषा में मतलब होता है फायर्ड यानि पकाई हुई मिट्टी। आसान शब्दों में कहे तो लाल रंग की क्ले को टेराकोटा कहते हैं। ये आर्ट भारत में विभिन्न राज्यों से अलग-अलग तरह से प्रचलित है। ये जानकारी कलांजलि आर्ट एकेडमी में आयोजित तीन दिनी टेराकोटा वर्कशॉप के पहले दिन आर्टिस्ट अनुश्री दुबे ने दी। उन्होंने बताया कि टेराकोटा आर्ट दो तरह की होती है, पहली हैंडमैड और दूसरा कुमार के चाक से तैयार की हुई। लाल मिट्टी का टेराकोटा आर्ट राजस्थान, कलकता, गुजरात और उत्तरप्रदेश में प्रचलित है। अनुश्री हैंडमैड टेक्निक से टेराकोटा आर्टिकल तैयार करने की तकनीक सिखाएंगी।

नैचरल तरीके से होता है तैयार

अनुश्री ने बताया कि ये क्ले नैचरल प्रोडक्ट है, इसे बनाया नहीं जाता है, केवल थोड़ा रिफाइन करने की जरूरत होती है। टेराकोटा आर्ट का उपयोग मिट्टी के बर्तन और सजावटी समान बनाने के लिए किया जाता है। हर राज्य के टेराकोटा आर्ट में वहां के फोक कल्चर की झलक दिखाई देती है। कलकता का टेराकोट वर्क राजस्थान से बिलकुल अलग होता है। जब पूरा आर्टिकल तैयार हो जाता है तो इसे भट्टी में पकाया जाता है। पुराने जमाने में लकड़ी की भट्टी बनाई जाती थी और अब बिजली से चलने वाली भट्टियों का उपयोग होता है। इन्हें ९०० डिग्री सेल्सियस पर पकाया जाता है और एक आर्टिकल को पकाने में ८ घंटे लगते हैं। पकाने के बाद ही इस पर कलर किया जाता हैं।

ये तीन तकनीक सिखाई जाएंगी

आर्टिस्ट हेमलता कुमार ने बताया कि इस वर्कशॉप में पोट्री की हैंडबिल्डिंग टेक्निक की ट्रेनिंग दी जा रही है। इसमें हाथ से किस तरह टेराकोटा आर्टिकल बनाया जाता है, ये बताया जा रहा है। पहले दिन पिंचपोट टेक्निक सिखाई गई, जिसमें हाथ से पोर्ट बनाया जाता है। पहले दिन आउल, एलिफेंट जैसे एनिमल के फेस तैयार किए गए।

दूसरे दिन कॉइल वर्क सिखाया जाएगा, जिसमें क्ले से कॉइल बनाई जाती है और उसके बाद उसमें अलग-अलग शेप दिए जाते हैं। तीसरे दिन स्लैब वर्क सिखाया जाएगा, जिसमें स्लैब बनाकर आर्टिकल तैयार करेंगे।